बिहार के बगहा में गंडक नदी पर प्रस्तावित बेलवनिया-शास्त्रीनगर पुल के निर्माण को रद्द किए जाने के फैसले ने स्थानीय जनता के जख्मों पर नमक छिड़क दिया है। शास्त्रीनगर चौक पर जो दृश्य दिखा, उसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यहाँ दर्जनों लोग सिर मुंडवाकर सड़क किनारे बैठ गए—यह किसी परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा के खिलाफ ‘सामूहिक शोक और आक्रोश’ का प्रतीक था।
60 किलोमीटर बनाम 8 किलोमीटर: क्या है पूरा विवाद?
स्थानीय ग्रामीणों का दर्द बहुत पुराना है। वर्तमान में बेलवनिया से शास्त्रीनगर जाने के लिए लोगों को लगभग 60 किलोमीटर का लंबा और थकाऊ सफर तय करना पड़ता है। यदि प्रस्तावित पुल का निर्माण हो जाता, तो यह दूरी घटकर मात्र 8 किलोमीटर रह जाती।
समय की बचत: घंटों का सफर मिनटों में सिमट जाता।
सुरक्षा: लोग जान जोखिम में डालकर गंडक नदी पार करने को मजबूर नहीं होते।
रोजगार: खेती और कामकाज के लिए बाजार तक पहुंच आसान हो जाती।
2018 से जारी है संघर्ष, अब धैर्य टूटा
ग्रामीणों का कहना है कि वे 2018 से लगातार इस पुल की मांग कर रहे हैं। प्रशासन और सरकार की ओर से आश्वासन तो मिला, लेकिन अंत में प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया गया। इसी हताशा में संघर्ष समिति ने मुंडन कराने का कठोर निर्णय लिया। प्रदर्शनकारियों की आंखों में सवाल था— “क्या हमारी पीड़ा गंडक की लहरों की तरह ही बहती रहेगी?”
चेतावनी: आंदोलन अब विधानसभा और लोकसभा तक जाएगा
संघर्ष समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सरकार के लिए अंतिम चेतावनी है।
बहिष्कार: क्षेत्र में जनप्रतिनिधियों के प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है।
विस्तार: यह आंदोलन अब बगहा से निकलकर पूरे जिले और फिर विधानसभा/लोकसभा स्तर तक फैलेगा।
हक की लड़ाई: लोगों ने साफ कहा कि पुल उनके लिए केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि उनके जीवन और सुरक्षा का अधिकार है।
फिलहाल प्रशासन इस पूरे मामले पर खामोश है, लेकिन शास्त्रीनगर चौक पर मुंडवाए हुए सिर और आक्रोशित भीड़ यह चीख-चीख कर कह रही है कि अब आश्वासन से काम नहीं चलेगा। जनता को पुल चाहिए।

