इतिहास की किताबों के धुंधले पन्नों से निकलकर जब हम 13 सितंबर 1929 की उस दोपहर में झांकते हैं, तो रूह कांप जाती है। यह कहानी एक 25 साल के उस नौजवान की है, जिसने अपनी जवानी की दहलीज पर मौत को इसलिए गले लगा लिया क्योंकि उसे गुलामी की रोटियों से ज्यादा अपनी गरिमा प्यारी थी। यह कहानी है जतिन नाथ दास की, जिन्हें दुनिया ‘जतिन दा’ के नाम से जानती है।
शुरुआत: सम्मान की एक छोटी सी मांग
लाहौर जेल की कालकोठरियों में कैद भारतीय क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजों का व्यवहार जानवरों से भी बदतर था। गंदा पानी, कीड़ों वाला खाना और पढ़ने के लिए किताबों पर पाबंदी। जतिन दा ने भगत सिंह और अन्य साथियों के साथ मिलकर इसके खिलाफ अनशन शुरू किया। उनकी मांग सरल थी हमें राजनीतिक कैदी का दर्जा मिले, हम अपराधी नहीं हैं।
जब फौलाद बन गया शरीर
दिन बीतते गए। 10 दिन, 20 दिन, 40 दिन। जतिन दा के शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां चमड़ी फाड़कर बाहर आने को बेताब थीं और हिलने-डुलने तक की ताकत खत्म हो चुकी थी। अंग्रेजों को लगा कि भूख इस लड़के को तोड़ देगी, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के संकल्प का बना है। जेल प्रशासन ने कोठरी में दूध के घड़े रखवाए ताकि जतिन दा अपनी भूख से हार जाएं, लेकिन उस वीर ने उन घड़ों को लात मारकर तोड़ दिया।
वो खौफनाक दोपहर: जब जुल्म की हद पार हुई
जब अनशन को दो महीने बीतने आए, तो घबराए हुए अंग्रेजों ने एक क्रूर साजिश रची। जेल के डॉक्टरों और सिपाहियों ने जतिन दा के निढाल शरीर को दबोच लिया। उनकी नाक में जबरदस्ती एक रबर की नली ठूंसी गई ताकि दूध पिलाया जा सके। दर्द से जतिन दा तड़प रहे थे, लेकिन इसी छीना-झपटी में वह नली भोजन नली की जगह उनके फेफड़ों में चली गई। दूध फेफड़ों में भर गया। जतिन दा को भयानक निमोनिया हो गया। वे खून की उल्टियां करने लगे, सांस लेना दूभर हो गया, लेकिन अपनी आखिरी सांस तक उन्होंने हार नहीं मानी। 13 सितंबर 1929 को, अनशन के 63वें दिन, उन्होंने भगत सिंह की बाहों में अपना सिर रखकर हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।
शहादत के बाद का सैलाब
जतिन दा की मौत ने पूरे देश की सोई हुई आत्मा को झकझोर दिया। जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया, तो हर स्टेशन पर हजारों की भीड़ आंखों में आंसू लिए खड़ी थी। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए एक ऐसा जनसैलाब जो इससे पहले कभी नहीं देखा गया था। सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया।
आज का सच
आज हम जिस आजादी की हवा में सांस ले रहे हैं, उसकी नींव में जतिन दा की वो गल चुकी हड्डियां दफन हैं। उन्होंने मरते वक्त कहा था, मैं बस एक साधारण इंसान हूं जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है। आजादी खैरात में नहीं मिली थी, इसके लिए किसी ने 63 दिन भूखे रहकर अपनी नसों का लहू सुखाया था। आज देश को जरूरत है उन भूले-बिसरे नायकों को याद करने की, जिन्होंने चरखे से पहले अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश की नींव रखी थी।

