आज का दौर डिजिटल चकाचौंध, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के छोटे वीडियो का है। इस शोर में लोक कलाएं और रंगमंच की पुरानी परंपराएं दम तोड़ रही हैं। लेकिन बिहार के मुंगेर जिले का नौवागढ़ी क्षेत्र आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। यहाँ का ‘श्री हंस वाहिनी नाट्य कला परिषद’ (बजरंगबली नगर) पिछले तीन दशकों से विलुप्त होती जा रही नाटक मंचन की परंपरा को न सिर्फ जीवित रखे हुए है, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का भागीरथ प्रयास भी कर रहा है।
तीन दशकों का अटूट सफर: विस्थापन भी नहीं डिगा सका हौसला
श्री हंस वाहिनी नाट्य कला परिषद की कहानी संघर्ष और कला के प्रति अटूट प्रेम की मिसाल है। इस परिषद की स्थापना वर्ष 1995 में मुंगेर सदर प्रखंड के गंगा पार टीकारामपुर पंचायत में हुई थी। संस्थापक अध्यक्ष सीताराम मंडल और निदेशक डॉ. फेकन मंडल के नेतृत्व में शुरू हुआ यह सफर मुश्किलों भरा रहा। वर्ष 1997 में भीषण गंगा कटाव के कारण पूरा गांव विस्थापित हो गया। कलाकारों के घर उजड़ गए, जमीनें गंगा में समा गईं, लेकिन नाटक खेलने का जज्बा नहीं डूबा। विस्थापित होकर यह टोली नौवागढ़ी के बजरंगबली नगर में बसी। नई जगह पर नए सिरे से जिंदगी शुरू हुई, लेकिन सरस्वती पूजा पर नाटक मंचन की परंपरा को उन्होंने टूटने नहीं दिया। विस्थापन के पूर्व दियारा के दुर्गम इलाकों में साधन विहीन होकर नाटक करना जितना कठिन था, आज भी उसे भव्य रूप में आयोजित करना इन कला प्रेमियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
सरस्वती पूजा पर सजेगा दो दिवसीय नाट्य महोत्सव
आगामी सरस्वती पूजा और माघी पूर्णिमा को लेकर नौवागढ़ी में उत्साह का माहौल है। श्री हंस वाहिनी नाट्य कला परिषद के बैनर तले दो दिवसीय नाट्य महोत्सव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। परिषद से जुड़े प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार दिन-रात अभ्यास में जुटे हैं। इन नाटकों का मुख्य केंद्र ‘सामाजिक कुरीतियां’ होती हैं, जिनके माध्यम से समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया जाता है। कलाकारों का कहना है कि वे शेक्सपियर की उस पंक्ति पर यकीन रखते हैं— “रास्ता तो मिल ही जाएगा भटकते-भटकते, उन्हें रास्ता क्या मिलेगा जो कभी घर से निकले ही नहीं।” इसी हौसले के साथ ये कलाकार रंगमंच को पुनर्जीवित करने के प्रयास में लगे हैं।
शासन की अनदेखी से मायूसी, पर बुलंद हैं हौसले
विगत 30 वर्षों से लगातार लोक कला की सेवा कर रहे इन कलाकारों को मलाल है तो बस शासन-प्रशासन की बेरुखी का। कला एवं संस्कृति विभाग हो या जिला प्रशासन, आज तक किसी ने भी इस परिषद की सुध नहीं ली। बिना किसी सरकारी अनुदान या सहयोग के, ये कलाकार चंदा इकट्ठा कर और आपसी सहयोग से इस विरासत को संवार रहे हैं। कलाकारों में इस बात को लेकर मायूसी तो है, लेकिन उनकी लगन में कोई कमी नहीं आई है।
वर्ष 2026 के लिए नई कमेटी का गठन
आयोजन को भव्य बनाने के लिए ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से नई कमेटी का गठन किया है। पारस मंडल को अध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार रंजीत विद्यार्थी को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कमेटी के अन्य प्रमुख पदों पर ललन कुमार (कोषाध्यक्ष), गीता प्रसाद साह (कोषाध्यक्ष), नेपाली मंडल (सचिव) और संजीत कुमार (उप सचिव) को चुना गया है। इसके अलावा 17 सदस्यीय कार्यकारिणी का गठन किया गया है जो महोत्सव की व्यवस्थाओं को संभालेगी।

