आज पूरा देश विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना कर रहा है। ऐसे में बात मां सरस्तवी की उस मानस पुत्री की जिसने आज से 55 साल पहले आधी आबादी की शिक्षा के महत्व को समझा और खुद अनपढ़ होने के बावजूद न केवल लड़कियों के लिए स्कूल खोला बल्कि अपना सब कुछ उनकी शिक्षा के लिए झोंक दिया। खबर हटके में हम आपको बताने जा रहे हैं अररिया की पद्म श्री कलावती देवी के बारे में। जिन्होंने आज से 55 साल पहले लड़कियों की शिक्षा का बीड़ा उठाया था।

रानीगंज में निर्धन किसान के घर जन्मीं थी कलावती देवी
पद्म श्री कलावती का जन्म अररिया जिला के रानीगंज प्रखंड के छर्रापट्टी गांव में एक निर्धन किसान के घर हुआ था। वे पिता नकछेदी मंडल व माता रामप्यारी देवी की दूसरी संतान थीं। उनका विवाह गांव के ही पंच लाल चौधरी से हुआ। पंच लाल चौधरी गंभीर बीमारी के शिकार थे। कलावती देवी और पंच लाल चौधरी को दो पुत्री हुईं। पति के गुजरने के बाद दोनों पुत्रियों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी कलावती देवी के कंधे पर आ गई। इस दौरान समाज के लोगों ने कलावती देवी को बहिष्कृत भी कर दिया था। कलावती ने समाज में फैली कुरीतियां व अंधविश्वास के चलते महिलाओं के नारकीय जीवन को महसूस किया, तो उनके मन में महिलाओं को शिक्षित करने की इच्छा जागृत हुई।

लड़कियों की शिक्षा के लिए भिक्षाटन, पैसे कम पड़े तो बेच PM की दी हुई साड़ी
कलावती ने सिर्फ अररिया, नही बल्कि बिहार के हर जिले में जाकर लड़कियों की शिक्षा के लिए भिक्षाटन किया। उनकी इस मेहनत और लगन को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी काफी प्रभावित हुई थीं। उन्होंने कलावती को अपने पास बुलाया और उपहार स्वरूप खादी की साड़ी भेंट की। लेकिन झोपड़ी में रहकर पक्के स्कूल भवन का सपना पूरा करने में पैसे की कमी हुई तो उन्होंने प्रधानमंत्री से उपहार में मिली साड़ी को भी बेच दिया और उस पैसे को लड़कियों की शिक्षा में लगाया।

1976 में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा
कलावती देवी का शिक्षा के प्रति समर्पण का नतीजा है कि आज अररिया जिले में कन्या मध्य विद्यालय, कन्या उच्च विद्यालय व डिग्री महाविद्यालय के भवन बने हुए हैं। अनपढ़ महिला के इस अथक प्रयास पर सरकार की नजर पड़ी और 30 अप्रैल 1976 को तत्कालीन राष्ट्रपति ने फखरुद्दीन अली अहमद ने उन्हें पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया।
