मृतक की तस्वीर।

पहले अंतिम संस्कार, फिर श्राद्ध और संपिण्डन, अगले दिन पहुंचा युवक का शव, निजी अस्पताल की संवेदनहीनता की नायाब कहानी

निजी अस्पतालों में मरीजों की शोषण की कहानी असाध्य है और मौत के बाद शव को बकाया राशि की वसूली के लिए बंधक बना लेना भी अब बिहार से लेकर नेपाल तक संक्रामक रोग के रूप में फैला हुआ है। इसी कड़ी में सुपौल जिला के किशनपुर प्रखण्ड के श्रीपुर सुखासन में जो वाकया घटित हुआ वह मानवीय संवेदना को झकझोरने वाला है और धरती का भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों और निजी अस्पताल संचालकों की संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण है। दरअसल हुआ यूं कि श्रीपुर के एक युवक प्रमोद शर्मा (25)की मौत 05 जनवरी को इलाज के दौरान नेपाल के विराटनगर स्थित न्यूरो हॉस्पिटल में हो गई। लेकिन, परिजन प्रमोद के शव को अस्पताल में ही छोड़ वापस लौटने के लिए मजबूर हुए।वापस आए परिजनों ने प्रमोद का पुतला बनाकर श्राद्ध और संपिण्डन कर्म भी कर डाला।इस प्रक्रिया के पूरी होने के बाद अगले दिन शनिवार को सामाजिक संगठनों के सहयोग से युवक का शव उसके गांव पहुंचा, तब उसका दोबारा दाह -संस्कार किया गया।

श्रीपुर सुखासन वार्ड संख्या 06 निवासी विद्यानंद शर्मा का पुत्र प्रमोद शर्मा पंजाब में रहकर मजदूरी किया करता था और अपने परिवार का भरण-पोषण करता था।पंजाब में उसकी तबियत खराब रहने लगी तो वह गांव लौट गया। स्थानीय डॉक्टरों ने प्रमोद को हायर सेंटर रेफर कर दिया।उसके बाद परिजनों द्वारा प्रमोद को इलाज के लिए विराटनगर स्थित न्यूरो हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां डॉक्टरों ने बताया कि प्रमोद को ब्रेन ट्यूमर है। मृतक की पत्नी किरण देवी ने बताया कि डॉक्टरों ने इलाज में करीब 04 लाख रुपए खर्च बताया था, जो जमा कर दिया गया। प्रमोद वहां 11 दिन भर्ती रहा और 05 जनवरी को ऑपरेशन के बाद उसका देहांत हो गया। इसके बाद न्यूरो हॉस्पिटल प्रबंधन ने पुन: 04 लाख रुपए की मांग परिजनों से किया। लेकिन,प्रमोद के परिवार ने अपनी गरीबी का हवाला देते हुए शेष राशि देने में असमर्थता जताया। हॉस्पिटल प्रबंधन ने शेष राशि जमा नहीं करने पर शव देने से इनकार कर दिया। जिसके बाद परिजन बिना शव के ही वापस गांव लौट गए।

गांव लौटने पर प्रमोद के परिजनों ने पूरी कहानी ग्रामीणों को सुनाई। लेकिन, शव की वापसी के लिए किसी ने कोई पहल नही किया बल्कि चुप्पी साध ली क्योंकि, मामला रुपये से जुड़ा हुआ था। जो समाज मृत्यु-भोज के लिए सूद पर पैसे देने के लिए हमेशा तैयार रहता है ,उसी समाज के लोगों का दोहरा-चरित्र प्रमोद के मामले में उजागर हुआ। अंत मे ग्रामीणों की सहमति से प्रमोद का पुतला बनाकर उसका दाह -संस्कार किया गया।

घटना की जानकारी फारबिसगंज की सामाजिक संस्था लाइफ सेवियर फाउंडेशन के सदस्यों को मिली। जिसके बाद संगठन के सदस्य मनीष कुमार व राहुल यादव ने कोशी रक्तवीर सेवा संगठन सिमराही के सदस्य गुड्डू व अरमान से संपर्क साधा। इसके बाद सामूहिक सहयोग से शनिवार को मृतक का शव एंबुलेंस के माध्यम से गांव लाया गया।दूसरी ओर,परिजनों के शव को बंधक बनाने के आरोप के बाबत न्यूरो हॉस्पिटल विराटनगर के प्रशासक प्रमुख राजेश भट्टराई ने कहा कि प्रबंधन के इनकार के बावजूद परिजनों के आग्रह पर मरीज का उपचार शुरु किया गया था। वह 22 दिनों तक यहां भर्ती रहा। तीन लाख रुपए के बिल में से परिजनों ने महज 01 लाख रुपए जमा किया था। लेकिन, देहांत के उपरांत हमने उसे भी माफ कर दिया। लेकिन परिजन शव ले जाने को तैयार नहीं हुए।अंत मे फारबिसगंज के सामाजिक संगठन लाइफ सेवियर फाउंडेशन के सहयोग से मृतक के घर का पता लगाया गया और अस्पताल ने अपने खर्च पर शव को गांव तक पहुंचाया।

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