मूर्ती में रंग भरती महिला मूर्तिकार।

मूर्तिकला के क्षेत्र में 11 वर्षों से मूर्तियां तराश रही बेटियां,नारी-सशक्तिकरण का है यह सशक्त उदाहरण

मूर्तिकला का क्षेत्र पुरुष-प्रधान माना जाता है और आज भी इस क्षेत्र में काफी हद तक महिलाओं की उपस्थित नगण्य है। लेकिन, पूर्णिया जैसे छोटे शहर में मूर्तियां को मिट्टी से आकार देते ,उसमें रंग भरती, उसका वस्त्र-विन्यास करती कोई बेटी नजर आ जाए तो तय मानिए कि यह नारी-सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण है। ऐसी ही दो बहनें जिन्हें यह कला विरासत में मिली है, पूर्णिया के पंच मुखी मंदिर के किनारे मूर्तियों को जीवंत बनाने के कवायद में तल्लीन देखी जा सकती है। बेशक, मूर्तिकला के क्षेत्र में देश स्तर पर कुछ महिलाएं ख्याति अर्जित कर चुकी है। लेकिन पूर्णिया की बेटी पूजा और आरती इस मायने में उनसे अलग है कि दोनों बहनें अभावों और संकटों से जूझती हुई इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में सफल रही है।

रामू मूर्तिकार मूर्तिकला के क्षेत्र में सीमांचल में चर्चित नाम हैं।वे साल 1995 में पूर्णिया में मूर्ति बनाना आरम्भ किए। उस समय पूजा और आरती छोटी थी जो रामू के साथ छोटे-छोटे कामों में सहयोग करती थी। धीरे-धीरे बाल-मन मूर्ति की दुनिया मे खुद का अस्तित्व तलाशने लगा । दोनों बहन ने अपनी मन की बात पिता को बताई तो वे तैयार हो गए।इस प्रकार वर्ष 2014 में जो पूजा और आरती मूर्ति-कला से जुड़ी तो आजतक दोनों बहनें मिट्टी की जादुई दुनिया से खुद को अलग नही कर सकी।हाथों में हुनर ऐसी कि उनकी गढ़ी हुई मूर्तियां मानो अभी-अभी बोल पड़ेगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि रामू को दो बेटे भी हैं लेकिन विरासत बेटियों के हिस्से में गई है और उनकी तीसरी बेटी भी मूर्तिकला का ककहरा सीख रही है। बेटी आरती कहती है कि आश्चर्य कैसा, लड़का और लड़की में कोई फर्क नही होता है.लड़कियां किसी भी क्षेत्र में किसी से कम नहीं है।

पूजा और आरती मूर्तिकला के प्रति इतनी समर्पित है कि उनके लिए यही अपनी दुनिया है। पूजा यह भी बताती है कि यह काम उसे बहुत अच्छा लगता है। इसमें लोगों का इज्जत और सम्मान बहुत मिलता है। शादी से जुड़े सवाल के जवाब में दोनों बहनें कहती है कि शादी अपनी जगह है और कला अपनी जगह है। अगर माथे पर सिंदूर लग जाए तो हम कला नही भूल जाएंगे। कोई गलत काम तो नही कर रहे जो ससुराल का लोग मना करेंगे। इतना ही नहीं कहती है कि अगर ससुराल के लोग राजी होंगे तो शादी करेंगे नही तो नही करेंगे ।

हर बाप चाहता है कि उसका बच्चा उससे अधिक नाम कमाए। वे तो अपनी बेटियों के पिता के साथ-साथ उसके गुरु भी हैं। इसलिए जब उनकी बेटियों ने उनके नक्शे-कदम पर चलना चाहा तो उन्होंने इनकार नही किया। रामू ने दोनों बेटियों को काम करने की पूरी आजादी दी। वे कहते हैं कि हम चाहते हैं कि मेरी बेटी हमसे बड़ा नाम कमाए, ऊँचाई को छुए। रामू मूर्तिकार जब अपनी बेटियों की बात करते हैं तो उनकी आंखों में आत्मविश्वास के साथ साथ अपनी बेटियों की काबिलियत पर भरोसा के अलावा मूर्तियों की तरह मूक लेकिन सजीव सपने भी तैरते नजर आते हैं। जाहिर है , मूर्तिकला का कैनवास बड़ा है और यहां आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं भी है। जब आने वाले दिनों में रामू की तीसरी बेटी भी तिकड़ी के रूप में मूर्तिकला के क्षेत्र में उतरेंगी तो इस क्षेत्र में एक नई पटकथा लिखी जाएगी।

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