Jananayak Karpoori Thakur: जब कार्यकर्ता की साइकिल बनी ‘सरकारी सवारी’, हजारों की भीड़ में जननायक ने महुआ तक किया सफर तय

डेस्क। न्यूजस्टिच
आज के दौर में जहां राजनीति ‘काफिले’ और ‘शक्ति प्रदर्शन’ का पर्याय बन चुकी है, वहीं भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर की स्मृतियां एक आईना दिखाने का काम करती हैं। समस्तीपुर का पितौझिया गांव जिसे आज दुनिया कर्पूरीग्राम के नाम से जानती है, एक ऐसी शख्सियत की गवाही देता है जिसने जातिवाद की संकीर्ण दीवारों को ढहाकर अमीरी बनाम गरीबी की असली लड़ाई लड़ी।

दिखावा नहीं, जुड़ाव ही पहचान थी
कर्पूरी ठाकुर के साथ लंबा समय बिताने वाले समस्तीपुर के परमानंद मिश्र बताते हैं कि जननायक के लिए सत्ता कभी सुख का साधन नहीं रही। वह अक्सर लोगों के बीच जाकर अलख जगाते थे उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहां जो सोवत है। यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि शोषित समाज को जगाने का उनका मंत्र था। आजकल के स्वयंभू नेताओं और कर्पूरी जी के दौर में जमीन-आसमान का फर्क था। पूर्व विधायक दुर्गा प्रसाद सिंह एक दिलचस्प वाकया साझा करते हैं, जो आज के रसूखदार नेताओं के लिए किसी सबक से कम नहीं है।

जब कार्यकर्ता की साइकिल बनी ‘सरकारी सवारी’
वाकया समस्तीपुर से पटना तक की एक साइकिल रैली का है। कर्पूरी जी के पास गाड़ी की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्होंने उनके साथ चलने का फैसला किया। दुर्गा प्रसाद सिंह बताते हैं कि उजियारपुर के बालमुकुंद सिंह के पास उस समय एक नई साइकिल थी। जननायक ने बिना किसी हिचकिचाहट के उनसे पूछा- क्या आप मुझे अपनी साइकिल पर बिठाकर ले चलेंगे?” हजारों की भीड़ के बीच, बिहार का वो दिग्गज नेता एक साधारण कार्यकर्ता की साइकिल के पीछे बैठकर महुआ तक का सफर तय कर गया। यह दृश्य आज की ‘बुलेटप्रूफ’ राजनीति में अकल्पनीय है।

धरोहर के रूप में खड़ी सादगी
आज भी उनकी पुरानी गाड़ी एक सुरक्षित धरोहर के रूप में खड़ी है, जो उस सादगी की मूक गवाह है। दुर्गा प्रसाद सिंह कहते हैं कि अब राजनीति में दिखावा अधिक है। वह दौर चला गया जब नेता कार्यकर्ताओं के पीछे नहीं, उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। जननायक का जीवन संदेश स्पष्ट है: पद से कोई नायक नहीं बनता, नायक बनने के लिए सादगी और उच्च विचारों को आत्मसात करना पड़ता है। उनकी यही विरासत आज भी उनके चाहने वालों को उनका मुरीद बनाए हुए है।

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