पटना। न्यूजस्टिच
बिहार की राजधानी को झकझोर देने वाले बहुचर्चित NIIT छात्रा दुष्कर्म मामले में अब एक नया गतिरोध सामने आया है। न्याय की उम्मीद लगाए बैठे लोगों के बीच यह खबर निराश करने वाली है कि विशेष जांच दल (SIT) की ओर से सौंपे गए अधूरे दस्तावेज अब जांच में सबसे बड़ा रोड़ा बन गए हैं। इस वजह से पटना एम्स (AIIMS) में चल रही फोरेंसिक रिव्यू की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
एम्स में विशेषज्ञों की टीम तैयार, पर रिकॉर्ड्स का इंतजार
पटना एम्स के निदेशक और अधीक्षक के निर्देश पर इस मामले की तह तक जाने के लिए एक उच्च स्तरीय मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया है। फोरेंसिक विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से 5 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम मामले की वैज्ञानिक समीक्षा के लिए तैयार है।
इस टीम में फोरेंसिक विभाग के दो विशेषज्ञों के अलावा, गायनाकोलॉजी, न्यूरोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ डॉक्टरों को शामिल किया गया है ताकि पीड़िता के साथ हुई बर्बरता की हर कोण से जांच हो सके। डॉ. विनय कुमार ने स्पष्ट किया, “मेडिकल रिव्यू पूरी तरह से उपलब्ध रिकॉर्ड्स और समय पर आधारित होता है। अगर दस्तावेज ही अधूरे होंगे, तो निष्कर्ष तक पहुंचना असंभव है।”
SIT की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
हैरानी की बात यह है कि जहां एक तरफ पुलिस प्रशासन जल्द खुलासे का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर SIT चरणबद्ध तरीके (किस्तों) में दस्तावेज सौंप रही है। एम्स के जानकारों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और शुरुआती मेडिकल साक्ष्यों के कुछ अहम हिस्से अब भी जांच टीम को नहीं मिले हैं। दस्तावेजों की इस लेटलतीफी के कारण रेडियोलॉजिकल और न्यूरोलॉजिकल रिव्यू की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
न्याय की मांग और बढ़ता दबाव
इस हाई-प्रोफाइल मामले ने पूरे बिहार में आक्रोश पैदा कर दिया है। तकनीकी संस्थान की छात्रा के साथ हुई इस दरिंदगी के बाद सुरक्षा व्यवस्था और पुलिसिया सक्रियता पर सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल, एम्स की टीम का नेतृत्व कर रहे डॉ. विनय कुमार ने आश्वासन दिया है कि जरूरत पड़ने पर अन्य विभागों के विशेषज्ञों को भी जोड़ा जाएगा, लेकिन शर्त वही है कि SIT को सभी वैज्ञानिक साक्ष्य और कागजात तत्काल मुहैया कराने होंगे। फिलहाल, बिहार की नजरें अब पुलिस मुख्यालय और पटना एम्स की फाइनल रिपोर्ट पर टिकी हैं। क्या अधूरी कागजी कार्रवाई केवल एक प्रशासनिक चूक है या जांच को लंबा खींचने की कोई प्रक्रिया, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

