No-confidence motion against Lok Sabha Speaker Om Birla

क्या बदल जाएंगे लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला!  118 सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए दिया नोटिस

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में बजट सत्र के दौरान जो कुछ हो रहा है वो तो यही बता रहा है कि संसद में सब ठीक नहीं चल रहा। लोकतंत्र के सदन राज्यसभा में पहले सभापति जगदीप धनखड़ और विपक्ष के बीच पूरे देश ने तनाव की स्थिति देखी, उसके बाद वहीं स्थिति कमोबेश अब लोकसभा के स्पीकर के साथ देखी जा रही है। इसी का नतीजा है कि विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I.A.) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है।

विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान उनकी आवाज को दबाया जा रहा है। हालिया सत्र में कई ऐसे मौके आए जब विपक्ष और स्पीकर के बीच तीखी नोकझोंक हुई। मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • पक्षपात का आरोप: विपक्षी दलों (कांग्रेस, सपा, DMK) का दावा है कि स्पीकर सत्ता पक्ष के प्रति नरम रुख रखते हैं और विपक्ष के महत्वपूर्ण मुद्दों (जैसे महंगाई, बेरोजगारी और हालिया जांच रिपोर्टों) पर चर्चा की अनुमति नहीं दे रहे।
  • माइक बंद करने का मुद्दा: सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्ष ने कई बार आरोप लगाया कि जब उनके नेता बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो उनका माइक बंद कर दिया जाता है।
  • सांसदों का निलंबन: हाल के दिनों में विपक्षी सांसदों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और उनके निलंबन ने इस आग में घी का काम किया। विपक्ष इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दे रहा है।

मंगलवार, 10 फरवरी को सदन का नजारा बदला हुआ था। जैसे ही नोटिस की खबर सार्वजनिक हुई, ओम बिरला ने खुद को सदन की कार्यवाही से अलग कर लिया। परंपरा के अनुसार, जब अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस विचाराधीन हो, तो वे आसन पर नहीं बैठते। उनकी जगह पीठासीन अधिकारियों के पैनल के सदस्यों ने सदन का संचालन किया। विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर वाला यह नोटिस अब लोकसभा महासचिव के पास है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 94 सांसदों को यह शक्ति देता है कि वे स्पीकर को पद से हटा सकें। इसके लिए लोकसभा नियमावली के अनुच्छेद 200 के तहत प्रक्रिया अपनाई जाती है:

  1. 14 दिन का नोटिस: अविश्वास प्रस्ताव पेश करने से 14 दिन पहले महासचिव को सूचित करना अनिवार्य है।
  2. 50 सदस्यों का समर्थन: सदन में प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सांसदों का खड़ा होकर समर्थन करना आवश्यक है।
  3. वोटिंग: प्रस्ताव स्वीकार होने के 10 दिनों के भीतर इस पर चर्चा और मतदान होता है।

भारत के संसदीय इतिहास में यह चौथी बार है जब स्पीकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया है:

  • 1954: पहले स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए प्रस्ताव लाया गया।
  • 1966: सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ मधु लिमये के नेतृत्व में प्रस्ताव पेश हुआ।

1987: सीपीएम सांसद सोमनाथ चटर्जी ने बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव लाया, जो खारिज हो गया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *