पूर्णिया। न्यूजस्टिच
बिहार के औद्योगिक गौरव का प्रतीक माने जाने वाले परोरा (के.नगर) स्थित राज्य के पहले इथेनॉल प्लांट से एक हृदयविदारक खबर सामने आई है। यहाँ सुरक्षा मानकों की कथित अनदेखी ने एक 26 वर्षीय युवा मजदूर, बुधो मुनि की जान ले ली। यह हादसा न केवल एक परिवार की आजीविका पर प्रहार है, बल्कि ‘औद्योगिक प्रगति’ के दावों के बीच मजदूरों की सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी है।
कैसे हुआ हादसा?
घटना उस वक्त हुई जब सरसी के चंपावती हरिटोल निवासी बुधो मुनि प्लांट के विशाल ‘सेलो’ (Silo) से चावल निकालने का काम कर रहे थे। इसी दौरान चावल का भारी अंबार उनके ऊपर गिर गया। विडंबना देखिए कि बुधो लगभग 15 मिनट तक चावल के नीचे दबे रहे। जब साथी मजदूरों ने हल्की आवाज सुनी, तब उन्हें बाहर निकाला गया। आनन-फानन में उन्हें GMCH पूर्णिया ले जाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
साख पर सवाल: बिना सेफ्टी किट के जोखिम भरा काम?
इस दुर्घटना ने प्लांट प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। साथी मजदूरों का स्पष्ट आरोप है कि बुधो को बिना किसी सेफ्टी किट (सुरक्षा उपकरण) के इतने जोखिम भरे काम में लगाया गया था। औद्योगिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मजदूर के पास उचित गियर और सुरक्षा निगरानी होती, तो शायद 15 मिनट तक दम घुटने वाली स्थिति पैदा नहीं होती।
उजड़ गया सात साल का संसार
मृतक बुधो पिछले सात महीनों से इस प्लांट में अपनी किस्मत संवारने आए थे। सात साल पहले हुई शादी के बाद वह अपने परिवार का मुख्य सहारा थे। उनकी पत्नी सिरोमुनि कुमारी के आंसू प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहे हैं। बुधो चार भाइयों में मंझले थे और अपनी मेहनत से परिवार को गरीबी से बाहर निकालने की कोशिश में जुटे थे।
मुआवजा बनाम जवाबदेही
हालांकि, प्लांट के अधिकारियों ने उचित मुआवजा और हर संभव मदद का भरोसा दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मुआवजा उस कमी को पूरा कर पाएगा? के.नगर थाना पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर जांच शुरू कर दी है। बिहार में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना स्वागत योग्य है, लेकिन क्या यह विकास मजदूरों की बलि देकर होगा? प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘बिहार के पहले इथेनॉल प्लांट’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान सुरक्षा मानकों में भी ‘नंबर वन’ बनें, ताकि फिर किसी ‘बुधो’ को अपनी जान न गंवानी पड़े।

