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BPSC Success Story: 4 फीट हाइट, आर्थिक तंगी…फिर भी BPSC में पाई सफलता, बहुत खास है नवादा की श्वेता की कहानी

पटना। न्यूजस्टिच
तुमसे नहीं हो पाएगा…इतनी छोटी हाइट में क्या करोगी? बचपन से समाज से मिले इन तानों को बिहार की एक बेटी ने अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। शारीरिक बनावट और तंगहाली के बावजूद, नवादा की रहने वाली 27 वर्षीय श्वेता कौर ने अपनी मेहनत के दम पर बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 67वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता का परचम लहराया है। 330वीं रैंक हासिल कर श्वेता आज सामाजिक सुरक्षा कोषांग (नवादा) में सहायक निदेशक के पद पर अपनी सेवाएं दे रही हैं।

दिव्यांग श्रेणी की जगह ‘जनरल मेरिट’ से मारी बाजी
महज 4 फीट की लंबाई के कारण श्वेता दिव्यांग श्रेणी में आती हैं, लेकिन उनका हौसला इतना बुलंद था कि उन्होंने किसी विशेष आरक्षण का सहारा लेने के बजाय सामान्य (General) श्रेणी की मेरिट लिस्ट में जगह बनाकर यह सफलता हासिल की। श्वेता कहती हैं, “मेरी पहचान मेरी हाइट नहीं, मेरी मेहनत और संकल्प है।

दिल्ली जाने का बजट नहीं था, BHU से की पढ़ाई
श्वेता की पढ़ाई का सफर भी आसान नहीं रहा। नवादा से शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन और फिर बीएड की डिग्री ली। मैट्रिक, इंटर और ग्रेजुएशन तीनों ही स्तरों पर उन्होंने 75% से अधिक अंक हासिल किए। उनका सपना दिल्ली जाकर यूपीएससी (UPSC) की तैयारी करने का था, लेकिन पिता ओम प्रकाश लाल (जो घर से ही कपड़े की दुकान चलाते हैं) की आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती थी। पैसों की तंगी के कारण श्वेता को वापस घर लौटना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने सपने को टूटने नहीं दिया।

‘घड़ी देखकर नहीं, लक्ष्य देखकर की पढ़ाई’
श्वेता ने घर पर रहकर ही BPSC की तैयारी शुरू की। उन्होंने धनंजय IAS अकादमी से मार्गदर्शन लिया और वैकल्पिक विषय के रूप में ‘हिंदी साहित्य’ को चुना। अपनी पढ़ाई के तरीके पर श्वेता बताती हैं, “मैंने कभी घंटों की गिनती करके पढ़ाई नहीं की। मेरा ध्यान इस बात पर होता था कि जो टॉपिक उठाया है, उसे पूरी तरह समझूं। पीटी (PT) के लिए तथ्य और मेंस (Mains) के लिए विश्लेषणात्मक सोच ही मेरी सफलता की कुंजी बनी।”

तानों से सफलता तक का सफर: युवाओं के लिए मिसाल
नवादा के पंपूकल मोहल्ले की रहने वाली श्वेता चार बहनों में सबसे बड़ी हैं। आज अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और अपने शिक्षकों को देते हुए श्वेता उन सभी युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन चुकी हैं, जिन्हें समाज उनकी शारीरिक बनावट या आर्थिक तंगी के कारण कमतर आंकता है। श्वेता की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी रुकावट आपकी मंजिल के बीच नहीं आ सकती।