छपरा की इस विदाई से शर्मसार हुआ समाज! कंधा देने कोई न आया, तो बेटियों ने ही थाम ली मां की अर्थी

छपरा। न्यूजस्टिच
बिहार के छपरा जिले से महज 22 किलोमीटर दूर, मढ़ौरा के जवईनियां गांव ने मानवता और सामाजिक मर्यादा के उस मुखौटे को उतार फेंका है, जिसे हम सभ्य समाज कहते हैं। एक गरीब मां की अर्थी और उसके पीछे सिसकती दो अनाथ बेटियों की तस्वीर ने यह साबित कर दिया है कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां इंसान तो जिंदा हैं, पर इंसानियत का दाह-संस्कार बहुत पहले हो चुका है।

कंधा देने कोई नहीं आया, बेटियों ने निभाया धर्म
कहानी एक ऐसी बेबस महिला की है, जिसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह गरीब थी। जब उसकी मौत हुई, तो उम्मीद थी कि बिरादरी और पड़ोसी दुख बांटने आएंगे। लेकिन अफसोस! जिस समाज में बेटियों के घर से बाहर निकलने पर हजारों बंदिशें लगाई जाती हैं, उसी समाज के कुलदीपकों और मठाधीशों ने अपने किवाड़ बंद कर लिए। जब मां की अंतिम यात्रा का समय आया, तो चार कंधे भी मयस्सर नहीं हुए। आखिरकार, उन दो बेटियों ने अपने कोमल कंधों पर मां की अर्थी का बोझ उठाया, जिन्होंने कभी गुड़ियों से खेलना सीखा था। वे बेटियाँ, जो समाज की नजर में अबल थीं, आज अपने ही समाज के खोखलेपन को बीच चौराहे पर नग्न खड़ा कर रही थीं।

तमाशबीन बना समाज, डिजिटल होती संवेदनहीनता
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में गाँव की गलियों में पसरता सन्नाटा और दूर खड़े तमाशबीन साफ देखे जा सकते हैं। लोग मोबाइल से वीडियो तो बना रहे थे, जैसे यह कोई फिल्म का सीन हो, लेकिन किसी का हाथ अर्थी को सहारा देने के लिए आगे नहीं बढ़ा। क्या हमारा समाज इतना संकुचित हो गया है कि गरीबी को देख हम कंधा देना भी भूल गए?

चिता की आग में जला सामाजिक अहंकार
जब उन बेटियों ने कांपते हाथों से अपनी माँ को मुखाग्नि दी, तो वह आग केवल चिता में नहीं लगी, बल्कि उन तमाम झूठे दावों में लगी जो एकजुटता और धर्म की रक्षा का ढोंग रचते हैं। उन बेटियों की लाल आँखें आज सवाल पूछ रही हैं कहां हैं वे रक्षक जो बेटियों के नाम पर राजनीति तो करते हैं, लेकिन उनके अनाथ होने पर अपनी गली बदल लेते हैं?

अंतिम संस्कार तो हुआ, अब श्राद्ध के लिए दर-दर की ठोकरें
त्रासदी यहीं खत्म नहीं होती। मां को विदा करने के बाद अब इन बेटियों के सामने भूख और रीति-रिवाजों का पहाड़ खड़ा है। गरीबी का आलम यह है कि तेरहवीं और श्राद्ध कर्म के लिए उनके पास फूटी कौड़ी नहीं है। वे बेटियां अब समाज और प्रशासन के आगे हाथ फैला रही हैं। यह उस देश के लिए शर्म की बात है जहाँ कन्या पूजन के लिए पंडाल सजते हैं, लेकिन हकीकत में उन कन्याओं को मां के अंतिम कर्म के लिए भीख मांगनी पड़ रही है।

एक मृत समाज की आह
अगर आज भी छपरा की इन बेटियों की पुकार सुनकर प्रशासन और समाज नहीं जागा, तो यह मान लेना चाहिए कि हम एक मृत समाज का हिस्सा हैं। जवईनियां गांव की इन बेटियों ने न सिर्फ अपनी मां को मुखाग्नि दी है, बल्कि उस ‘जातीय और सामाजिक अहंकार’ का भी अंतिम संस्कार कर दिया है जो खुद को श्रेष्ठ मानता है।

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