आज के दौर में जहां छोटे जन प्रतिनिधि भी आलीशान बंगलों और काफिलों में चलते हैं, वहीं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर की यादें आज भी एक ‘झोपड़ी’ में सुरक्षित हैं। ताज्जुब की बात यह है कि दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके पास अपना एक पक्का मकान तक नहीं था। उनकी सादगी का आलम यह था कि उनके निधन के बाद जब दिग्गज नेता उनके गांव पहुंचे, तो फूस की झोपड़ी देखकर दंग रह गए थे।
“जब सबका घर बन जाएगा, तब मेरा बनेगा’
उनके करीबी रहे समाजवादी नेता बनारसी ठाकुर बताते हैं कि जब भी लोग कर्पूरी जी से अपना घर बनवाने का आग्रह करते, तो उनका एक ही जवाब होता था— “जब पूरे बिहार के गरीबों का घर पक्का हो जाएगा, तब मैं अपने लिए घर बनाऊंगा।” उनके इसी त्याग और नि:स्वार्थ सेवा के कारण जनता ने उन्हें ‘जननायक’ की उपाधि दी, जो किसी सरकारी पदवी से कहीं बड़ी है।
बेटी की शादी और वो आधी रात का वाकया
बनारसी ठाकुर एक दिलचस्प वाकया साझा करते हैं। जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री थे, तब उनके पैतृक गांव में उनकी बेटी की शादी तय हुई। हैरान करने वाली बात यह थी कि जिले के कलेक्टर (DM) और एसपी (SP) तक को इसकी कानों-कान खबर नहीं थी। शादी वाली रात के अगले दिन सुबह जब वरिष्ठ नेता कपिल देव सिंह को पता चला, तो वे आनन-फानन में मोटरसाइकिल से उनके दरवाजे पहुंचे। बाद में जब डीएम को कलेक्ट्रेट के कर्मचारियों से सूचना मिली, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि एक मुख्यमंत्री की बेटी की शादी इतनी खामोशी से हो सकती है। सरकारी तंत्र को दूर रखने के पीछे कर्पूरी जी का एक ही तर्क था। “निजी कार्यों में सरकारी पैसे की एक पाई भी खर्च नहीं होनी चाहिए।’
GKPD कॉलेज में आज भी जिंदा है वो यादें
भले ही समय के साथ उनका असली झोपड़ीनुमा घर ढह गया और वहां स्मृति भवन बन गया, लेकिन उनकी यादों को संजोने के लिए GKPD कॉलेज परिसर में ठीक वैसी ही झोपड़ी बनाई गई है। वहां उनके उपयोग में लाए गए सामान और उनकी सादगी के साक्ष्यों को आज भी संजोकर रखा गया है, जो आने वाली पीढ़ियों को ईमानदारी की राजनीति का पाठ पढ़ा रही है।

