बिहार के सीमांचल क्षेत्र के लिए एक ऐसी खबर आई है जो इतिहास बदलने वाली है। लगभग 17 वर्षों से फाइलों में दबी जलालगढ़-किशनगंज (51.632 किमी) नई रेल लाइन परियोजना अब धरातल पर उतरने के लिए तैयार है। रेलवे ने इस प्रोजेक्ट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर अंतिम मंजूरी के लिए रेलवे बोर्ड को भेज दी है।
100 साल का इंतजार और एक ऐतिहासिक उपलब्धि
पूर्णिया जिले के लिए यह पल ऐतिहासिक है। रिकॉर्ड बताते हैं कि 15 सितंबर 1928 को पूर्णिया-मुरलीगंज लाइन के निर्माण के बाद से जिले में एक भी किलोमीटर नई रेल पटरी नहीं बिछाई गई है। यदि यह प्रोजेक्ट शुरू होता है, तो लगभग एक सदी (100 साल) बाद पूर्णिया के रेल मानचित्र में कोई नया विस्तार जुड़ेगा।
17 साल देरी की से 5 गुणा ज्यादा बढ़ा बजट
इस परियोजना की नींव 2008-09 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने रखी थी। उस वक्त इसकी लागत महज 360 करोड़ रुपये आंकी गई थी। लेकिन 17 साल की देरी ने इस बजट को करीब 5.14 गुना बढ़ा गया है। अब इस नई रेल लाइन को बिछाने में 1852 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
सामरिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है यह रेल लाइन
पूर्णिया के जलालगढ़ प्रखंड से किशनगंज तक बनने वाली रेलवे लाइन यात्री सुविधा ही नहीं बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर के लिए अल्टरनेट रूट : जलालगढ़-किशनगंज रेलवे रूट संवेदनशील चिकन नेक (Siliguri Corridor) के लिए एक अल्टरनेट रूट प्रदान करेगी।
- पूर्णिया और कटिहार से सीधे जुड़ेगा NJP: सैन्यसंर्घष और आपात स्थिति में सैनिकों के लिए रसद और जवानों को एनजेपी (NJP) से सीधे पूर्णिया और कटिहार पहुंचाने में यह मार्ग उपयोगी होगा।
ये 8 नये रेलवे स्टेशन आएंगे अस्तित्व में
इस रूट के निर्माण से खाताहाट, रौटा और महीनगांव समेत कुल 8 नए स्टेशन अस्तित्व में आएंगे। जलालगढ़, अमौर और बैसा जैसे बाढ़ प्रभावित और पिछड़े इलाकों के सीधे रेल नेटवर्क से जुड़ने से स्थानीय व्यापार, विशेषकर जूट और मक्का की खेती को वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलेगी।

