जब फिजाओं में रामनवमी की गूंज सुनाई देने लगती है, तब गया के एक छोटे से घर में सिलाई मशीनों की रफ्तार बढ़ जाती है। यहाँ धर्म की दीवारें तब छोटी पड़ जाती हैं, जब मोहम्मद सलीम और उनका परिवार पूरी शिद्दत के साथ केसरिया कपड़ों पर जय श्री राम उकेरने में जुट जाता है। यह महज एक व्यापार नहीं, बल्कि सात दशकों से चली आ रही एक ऐसी इबादत है, जिसमें धागे तो सूती हैं, लेकिन उनमें पिरोया गया अहसास साझी विरासत का है।
तीन पीढ़ियों का अटूट विश्वास
मोहम्मद सलीम के परिवार के लिए रामनवमी का इंतजार किसी ईद से कम नहीं होता। पिछले 70 सालों से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। सलीम के पिता और दादा ने जिस हुनर को थामकर गंगा-जमुनी तहजीब की नींव रखी थी, आज उसे तीसरी पीढ़ी पूरी गरिमा के साथ आगे बढ़ा रही है। मोहम्मद रफीक बताते हैं कि उनके हाथों ने अब तक लाखों झंडे सिले हैं, और हर झंडे के साथ उनकी दुआएं भी जुड़ी होती हैं।
सम्मान के साथ गूंजता है राम नाम
इस कार्यशाला की सबसे खूबसूरत बात यह है कि जब कारीगर झंडों पर ‘जय श्री राम’ लिखते हैं, तो वे खुद भी बड़े ही आदर के साथ इस नाम का उच्चारण करते हैं। उनके लिए यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक रूहानी अनुभव है। सलीम कहते हैं, आजकल समाज में जो भी बहस हो, लेकिन हमारे यहाँ जब हिंदू भाई झंडे लेने आते हैं, तो हम सिर्फ कारीगर और ग्राहक नहीं होते; हम उस भरोसे का हिस्सा होते हैं जो दशकों पुराना है।
भरोसे का भगवा रंग
स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग भी वर्षों से इसी परिवार पर भरोसा जताते आ रहे हैं। उनके लिए इन झंडों की पवित्रता तब और बढ़ जाती है, जब वे देखते हैं कि इन्हें बनाने वालों के मन में इस त्योहार के प्रति उतनी ही श्रद्धा है जितनी एक भक्त के मन में।
बदलते दौर में अटूट संदेश
आज के डिजिटल और अक्सर बंटे हुए समाज में, मोहम्मद सलीम का परिवार एक शांत लेकिन शक्तिशाली संदेश दे रहा है। वे बताते हैं कि असली भारत की ताकत एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होने में है। जब रामनवमी के जुलूस में उनके द्वारा सिले गए झंडे आसमान में लहराते हैं, तो वह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि पूर्णिया की उस मिट्टी की महक होती है जहाँ प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।

