पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और प्रशासनिक निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। एक तरफ जहाँ भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने सत्ताधारी दल के नेताओं की सुरक्षा में तैनात भारी पुलिस बल को लेकर नाराजगी जताई है, वहीं दूसरी ओर मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की खौफनाक घटना की जांच अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपने हाथ में ले ली है।
2185 पुलिसकर्मी केवल TMC नेताओं के लिए: चुनाव आयोग सख्त
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने एक चौंकाने वाला डेटा साझा करते हुए बताया है कि चुनावों की घोषणा से ठीक पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा केवल राजनीतिक हितों के लिए झोंक दिया है। आयोग के अनुसार, राज्य सरकार ने 832 ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षा कवच दिया है जो सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त 144 अन्य लोग भी TMC के समर्थक हैं।
इन कुल 976 लोगों की सुरक्षा में 2,185 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। ECI ने इस पक्षपातपूर्ण रवैये को ‘गंभीर चूक’ माना है। आयोग ने पश्चिम बंगाल के DGP को अल्टीमेटम देते हुए निर्देश दिया है कि अगले 2-3 दिनों के भीतर इस सुरक्षा व्यवस्था की कड़ी समीक्षा की जाए और पुलिस बल का वितरण निष्पक्ष एवं समान रूप से सुनिश्चित किया जाए।
मालदा कांड: NIA की 24 सदस्यीय टीम ने शुरू की जांच
राज्य में प्रशासनिक विफलता का सबसे भयावह उदाहरण 2 अप्रैल 2026 को मालदा में देखने को मिला। यहाँ मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) कार्य में लगे 7 न्यायिक अधिकारियों को भीड़ ने कालियाचक बीडीओ कार्यालय में बंधक बना लिया था। आरोप है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की अफवाह के बाद उग्र भीड़ ने पथराव किया और अधिकारियों को घंटों तक बंधक बनाकर रखा।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और चुनाव आयोग के हस्तक्षेप के बाद इस मामले की जांच NIA को सौंपी गई है। शुक्रवार को NIA की एक 24 सदस्यीय विशेष टीम ने मालदा के मोथाबाड़ी और कालियाचक पुलिस स्टेशनों का दौरा किया। टीम ने मौके से महत्वपूर्ण साक्ष्य एकत्र किए हैं और वे अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को सौंपेंगे।
अब तक 35 गिरफ्तार, सुरक्षा पर उठे सवाल
इस हिंसा और बंधक मामले में पश्चिम बंगाल पुलिस ने अब तक मुख्य साजिशकर्ता सहित 35 लोगों को गिरफ्तार किया है। हालांकि, इस घटना ने राज्य में न्यायिक अधिकारियों और चुनाव ड्यूटी पर तैनात कर्मियों की सुरक्षा पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक अधिकारियों को डराना-धमकाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। अब सबकी नजरें NIA की रिपोर्ट और चुनाव आयोग द्वारा सुरक्षा समीक्षा के बाद उठाए जाने वाले कदमों पर टिकी हैं।

