बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे होने के जश्न के बीच, राज्य की बदहाल स्थिति और विकास के राष्ट्रीय सूचकांकों में इसकी ‘आसमानी विफलता’ को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। आंकड़ों के आईने में बिहार की वर्तमान स्थिति को रखते हुए NDA सरकार के 21 साल के शासनकाल पर गंभीर सवालिया निशान खड़े किए गए हैं। इसी कड़ी में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का चैलेंज सामने आया है, जिसमें उन्होंने सरकार को विकास के मुद्दों पर सार्वजनिक बहस की चुनौती दी है।
नीति आयोग बिहार रैंकिंग: विकास के हर पैमाने पर निचले पायदान पर राज्य
हालिया आंकड़ों और नीति आयोग बिहार रैंकिंग की रिपोर्टों का हवाला देते हुए यह बात सामने आई है कि बिहार आज भी देश का सबसे पिछड़ा राज्य बना हुआ है। बिहार का विकास दावों में तो दिखता है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रति व्यक्ति आय जैसे बुनियादी मानकों पर बिहार राष्ट्रीय औसत से कोसों दूर है।
आर्थिक और औद्योगिक विफलता
बिहार में प्रति व्यक्ति आय, निवेश, उपभोग और ग्रामीण आय देश में सबसे कम है। राज्य का साख-जमा अनुपात (CDR) चिंताजनक स्तर पर है, वहीं KCC लोन के मामले में भी यहां के किसानों को देश में सबसे कम ऋण मिलता है। औद्योगीकरण के अभाव में बिहार निवेश के मामले में आज भी ‘फिसड्डी’ साबित हो रहा है।
बिहार शिक्षा और स्वास्थ्य रिपोर्ट की जर्जर स्थिति
बिहार शिक्षा और स्वास्थ्य रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का प्यूपिल-टीचर रेशियो (PTR) और स्कूल ड्रॉप-आउट रेट देश में सबसे खराब स्थिति में है। उच्च शिक्षा की बात करें, तो प्रति एक लाख आबादी पर कॉलेजों की संख्या सबसे कम है। स्वास्थ्य सेवाओं का आलम यह है कि राज्य में डॉक्टरों के लगभग 58% पद रिक्त हैं। इसका सीधा असर पोषण पर दिख रहा है, जहाँ बिहार में ‘स्टंटेड’ (बौने) बच्चों और एनीमिया से पीड़ित महिलाओं की संख्या सर्वाधिक है।
कुशासन, पलायन और बिहार में बेरोजगारी का दंश
आरोप है कि 21 वर्षों के एनडीए शासन और 12 वर्षों की ‘डबल इंजन’ सरकार के बावजूद बिहार में बेरोजगारी और पलायन की समस्या कम होने के बजाय बढ़ी है। देश के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में बिहार के शहरों का दबदबा है, और हिंसक अपराध व अपहरण के मामलों में राज्य की छवि अब भी धूमिल है। बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) के मामले में भी बिहार शीर्ष पर बना हुआ है, जहां आज भी 14% आबादी झोपड़ियों में रहने को मजबूर है।
सफेद झूठ और चुनावी प्रलोभन पर कटाक्ष
विपक्षी खेमे ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि जब तक समस्याओं को चिह्नित कर उनका समाधान नहीं किया जाएगा, तब तक सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करती रहेगी। चुनाव के समय 10 हजार नकद, 1 करोड़ नौकरी और महिलाओं को 2 लाख रुपये जैसे वादों को सफेद झूठ करार दिया गया है।
तेजस्वी यादव ने सीधा हमला करते हुए कहा, “अगर मुख्यमंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्रियों में नैतिक साहस है, तो वे बिहार की इस बदहाली और सरकार के अपने ही आंकड़ों पर सार्वजनिक बहस करें।”
क्या होगा भविष्य?
आंकड़ों का यह यथार्थ बिहार के शासन मॉडल पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। एक तरफ जहां शराबबंदी जैसे फैसलों को सामाजिक क्रांति बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मानवीय और आर्थिक विकास के सूचकांक चीख-चीखकर राज्य की बदहाली बयां कर रहे हैं। अब देखना यह है कि सरकार इन गंभीर आरोपों और विकास के इन कड़वे तथ्यों का जवाब किस तरह देती है।
