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पूर्णिया में पांडुलिपि संरक्षण की नई क्रांति: आर्टेटेरिया की कोसी पेंटिंग शैली ने खींचा अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का ध्यान

ज्ञानभारताम मिशन के तहत सांस्कृतिक धरोहरों के सर्वेक्षण हेतु नवा नालंदा महाविहार के सहायक प्रोफेसर डॉ. तपस सरकार एवं डॉ. रूप नारायण भैना ने पूर्णिया स्थित ‘आर्टेटेरिया’ का भ्रमण किया। इस महत्वपूर्ण दौरे पर उनके साथ जिला कला पदाधिकारी श्री पंकज पटेल भी उपस्थित रहे।

भ्रमण के दौरान टीम ने आर्टेटेरिया में संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों का गहन अवलोकन किया। विशेषज्ञों ने यहाँ पांडुलिपि संरक्षण की एक ऐसी अभिनव शैली देखी, जहाँ पारंपरिक धरोहर को कला के माध्यम से न केवल सुरक्षित रखा जा रहा है, बल्कि उसे एक आधुनिक पहचान भी दी जा रही है। टीम ने इस प्रयास को पांडुलिपि संरक्षण की एक ‘नई विधा’ करार देते हुए इसकी सराहना की।

इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार राजीव राज के कार्यों पर विशेष चर्चा हुई। पिछले 25 वर्षों से कोसी पेंटिंग शैली को गढ़ने वाले राजीव राज ने पांडुलिपि संरक्षण में एक ऐतिहासिक प्रयोग किया है। उन्होंने प्राचीन पांडुलिपियों के एंटीक लुक, मूल रंग-संयोजन और उनके ऐतिहासिक स्वरूप को अपनी पेंटिंग्स में समाहित किया है। यह कला शैली न केवल आधुनिक और रचनात्मक है, बल्कि यह इतिहास को जीवंत बनाए रखने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है।

राजीव राज की ‘सप्तकोसी’ पर आधारित कलाकृतियों की प्रदर्शनी हाल ही में नेपाल में आयोजित की गई थी। इससे पूर्व दुबई, टोक्यो (जापान) और स्विट्जरलैंड जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उनकी कला को वैश्विक सराहना मिल चुकी है। पूर्णिया के पूर्व जिला पदाधिकारी अंशुल कुमार भी उनके इस योगदान के लिए उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।

आर्टेटेरिया का यह प्रयास साबित करता है कि कला के माध्यम से हम अपनी लुप्त होती धरोहरों को नई पीढ़ी के लिए सुरक्षित और आकर्षक बना सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह नवाचार सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

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