राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने झारखंड के चर्चित देवघर चारा घोटाला मामले में लालू यादव की ज़मानत (सज़ा के निलंबन) को रद्द करने से साफ़ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और राज्य सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निपटारा करते हुए झारखंड हाई कोर्ट के पुराने आदेश में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड हाई कोर्ट को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि इस मामले से जुड़ी आपराधिक अपील पिछले 7 साल से अधिक समय से लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट को इस पर तेज़ी से सुनवाई करते हुए 6 महीने के भीतर फैसला सुनाना चाहिए।
कानूनी मुद्दा खुला, पर राहत बरकरार
जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने साफ किया कि वह झारखंड हाई कोर्ट द्वारा 12 जुलाई 2019 को लालू यादव की सज़ा निलंबित करने (Suspension of Sentence) के आदेश पर रोक नहीं लगाएगी। विशेष बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़े ‘कानूनी मुद्दे’ को भविष्य के लिए खुला रखा है, लेकिन वर्तमान स्थिति में लालू यादव की ज़मानत को पूरी तरह बरकरार रखा है। इससे आरजेडी कैंप और लालू समर्थकों ने बड़ी राहत की सांस ली है।
कोर्ट रूम ड्रामा: सज़ा की अवधि पर भिड़े वकील
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और सीबीआई की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने कोर्ट में आक्रामक दलीलें पेश कीं। CBI की दलील: एएसजी ने तर्क दिया कि झारखंड हाई कोर्ट ने लालू यादव को इस आधार पर ज़मानत दी थी कि उन्होंने अपनी सज़ा का 50 फीसदी (आधा) हिस्सा जेल में काट लिया है, जो कि तकनीकी रूप से सही नहीं था। याचिकाओं का हवाला: सरकारी वकील ने कोर्ट को यह भी याद दिलाया कि इससे पहले लालू यादव की सज़ा पर रोक लगाने की दो याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं, जिसके बाद तीसरी याचिका में उन्हें राहत मिली थी। हालाँकि, सर्वोच्च अदालत इन दलीलों से सहमत नहीं हुई। पीठ ने रुख अपनाया कि चूंकि मामला 2018 से लंबित है और लंबा वक्त गुज़र चुका है, इसलिए इस मोड़ पर हाई कोर्ट के आदेश में दखल देना न्यायसंगत नहीं होगा।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद झारखंड के देवघर कोषागार से अवैध रूप से सरकारी धन निकालने (चारा घोटाला) से जुड़ा है। इस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने लालू यादव को दोषी ठहराते हुए सज़ा सुनाई थी। इसके बाद, साल 2019 में झारखंड हाई कोर्ट ने लालू यादव की बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उनकी आधी सज़ा पूरी होने के आधार पर उन्हें ज़मानत दे दी थी, जिसे सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणी:
इस मामले को सात साल से अधिक का समय बीत चुका है। अपील वर्ष 2018 से लंबित है, ऐसे में हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। बेहतर होगा कि हाई कोर्ट 6 महीने के भीतर इस मुख्य अपील पर अंतिम फैसला कर दे।
राजनीतिक मायने और आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब गेंद एक बार फिर झारखंड हाई कोर्ट के पाले में है। अगले 6 महीनों के भीतर इस मामले में अपील पर अंतिम सुनवाई पूरी होनी है। इस फैसले ने तकनीकी रूप से सीबीआई की याचिका को तो ख़ारिज कर दिया है, लेकिन त्वरित सुनवाई का निर्देश देकर यह भी साफ़ कर दिया है कि कानूनी प्रक्रिया को अब और लंबा नहीं खींचा जा सकता। फिलहाल, लालू यादव के लिए यह एक बड़ी कानूनी और नैतिक जीत मानी जा रही है।

