सीमांचल में टीबी से भी खतरनाक हुई ये बीमारी!  डॉ.यूबी सिंह के शोध ने दुनिया को चौंकाया, क्या मौत के जाल में फंस रहे हैं हमारे श्रमिक?

उत्तर बिहार और विशेषकर सीमांचल के मजदूरों के लिए एक डरावनी खबर सामने आई है। प्रसिद्ध चेस्ट व टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ.यू.बी.सिंह के एक ताजा शोध ने इस क्षेत्र में सिलिकोसिस और सिलिकोट्यूबरकुलोसिस के बढ़ते कहर को उजागर किया है। डॉ.सिंह का यह मूल शोध पत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा ग्रंथ प्रोग्रेस ऑफ मेडिसिन 2026 (वॉल्यूम 36) में प्रकाशित हुआ है। जिसने चिकित्सा जगत का ध्यान सीमांचल की ओर खींचा है।

डॉ.यूबी सिंह ने अपने शोध सिलिकोसिस एंड सिलिकोट्यूबरकुलोसिस: द ग्रोइंग मेनेस इन नॉर्थ बिहार (सीमांचल) में उन प्रवासी मजदूरों की व्यथा को वैज्ञानिक आधार पर रखा है। जो राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों के पत्थर खनन और सैंडब्लास्टिंग उद्योगों में काम कर लौटते हैं। धूल भरे इन उद्योगों में काम करने के कारण उनके फेफड़ों में सिलिका के सूक्ष्म कण जमा हो जाते हैं। जो धीरे-धीरे उन्हें मौत के करीब ले जाते हैं।

डॉ.सिंह के अनुसार जब सिलिकोसिस (फेफड़ों की कठोरता) और टीबी (क्षय रोग) एक साथ मिलते हैं, तो इसे सिलिकोट्यूबरकुलोसिस कहा जाता है। यह स्थिति सामान्य टीबी से कई गुना अधिक जानलेवा होती है। सिलिका धूल फेफड़ों की रक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर देती है। इससे मजदूर टीबी के प्रति अति संवेदनशील हो जाते हैं। जागरूकता और सुविधाओं की कमी के कारण कई मामले समय पर दर्ज ही नहीं हो पाते।

विश्व टीबी दिवस के अवसर पर प्रकाशित यह लेख उन दिवंगत मजदूरों को समर्पित है, जिनकी जान इस बीमारी ने ले ली। डॉ.सिंह ने अपने मार्गदर्शक प्रोफेसर कमलेश तिवारी, प्रोफेसर बी.बी. ठाकुर और अपने बड़े भाई डॉ.देवी राम के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह केवल एक मेडिकल पेपर नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की दर्दनाक हकीकत है।

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.यू.बी.सिंह ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह बीमारी क्षेत्र में बड़ी आपदा का रूप ले लेगी। उन्होंने मांग की है कि प्रभावित मजदूरों की नियमित अनिवार्य स्क्रीनिंग हो। उद्योगों में सुरक्षा उपकरण (PPE) सुनिश्चित किए जाएं। पीड़ित मजदूरों के लिए विशेष सरकारी स्वास्थ्य पैकेज और पुनर्वास कार्यक्रम चलाया जाए। यह केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और ऑक्यूपेशनल हेल्थ संकट है। समय रहते स्क्रीनिंग ही एकमात्र बचाव है।

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