पटना। न्यूजस्टिच
बिहार की सियासत में इन दिनों एक दिलचस्प चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। क्या भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव को राज्यसभा जाना चाहिए? सोशल मीडिया पर छिड़ी यह बहस अब महज प्रशंसकों की दीवानगी तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने एक गंभीर राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। समर्थकों और विरोधियों के बीच तुलना का केंद्र बने हैं आम आदमी पार्टी के फायरब्रांड नेता राघव चड्ढा।
सोशल मीडिया पर छिड़ा ‘शब्द युद्ध’
बहस की शुरुआत विरु किशन वंशी और विकास कुमार जैसे समर्थकों के पोस्ट से हुई, जिनका मानना है कि यदि तेजस्वी यादव खेसारी लाल को राज्यसभा भेजते हैं, तो देश को दूसरा राघव चड्ढा मिल जाएगा। समर्थकों का तर्क है कि जिस तरह संजय सिंह और राघव चड्ढा सदन में विपक्षी आवाज को बुलंद करते हैं, उसी तरह खेसारी लाल यादव बिहार के मुद्दों को ‘गूंगा-बहरा’ प्रशासन के कानों तक पहुंचाएंगे।
शिक्षा बनाम लोकप्रियता: राघव चड्ढा vs खेसारी
हालांकि, इस तुलना ने एक बड़े वर्ग को नाराज भी किया है। अमरजीत कुमार और मनीष सिंह जैसे यूजर्स ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राघव चड्ढा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और उच्च शिक्षित व्यक्ति हैं, जबकि खेसारी की तुलना उनसे करना तर्कसंगत नहीं है। मनीष सिंह ने तो यहाँ तक लिख दिया राघव चड्ढा CA vs खेसारी अंगूठा छाप। विरोधियों का तर्क है कि राज्यसभा ‘बौद्धिक लोगों’ का सदन है, न कि केवल ताली बजवाने वालों का।

मनोज झा और संसदीय गरिमा की दुहाई
नीरज शर्मा और दिलीप राज जैसे प्रबुद्ध वर्ग के यूजर्स ने राजद के ही सांसद प्रो. मनोज झा का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्यसभा में वैसे लोग होने चाहिए जो किताबों से दोस्ती रखते हों और जिनके भाषणों में गहराई हो। उनके अनुसार, राघव चड्ढा शालीन और संसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, जबकि खेसारी लाल की छवि एक कलाकार की है, जो शायद सदन की गरिमा के अनुरूप न हो।
तेजस्वी यादव की लीडरशिप पर सवाल
इस बहस की आंच राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव तक भी पहुंची। सुधीर यादव जैसे आलोचकों ने तेजस्वी को एक ‘अपरिपक्व’ नेता करार देते हुए कहा कि उनमें लालू जी जैसा कोई गुण नहीं है। वहीं आलोक झा ने वर्तमान राजनीतिक समीकरणों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि राजद और कांग्रेस चाहे जितने भी दांव चल लें, वे भाजपा-एनडीए के सामने टिक नहीं पाएंगे।
कला बनाम राजनीति का द्वंद्व
भोजपुरी सितारों का राजनीति में आना नया नहीं है—मनोज तिवारी, रवि किशन और पवन सिंह इसके उदाहरण हैं। लेकिन राज्यसभा जैसे ‘उच्च सदन’ के लिए खेसारी लाल का नाम उछालना यह दर्शाता है कि बिहार की जनता अब अपने चहेते सितारों को नीति-निर्धारण की मुख्यधारा में देखना चाहती है। हालांकि, शिक्षा, भाषा शैली और वैचारिक समझ जैसे मुद्दे इस राह में बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

