डेस्क। न्यूजस्टिच
कहते हैं कि अगर किसी लक्ष्य को पाने की जिद पाल ली जाए, तो समंदर का रास्ता भी बदला जा सकता है। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के एक छोटे से गांव के रहने वाले बिट्टू सिंह रघुवंशी ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। जिस उम्र में युवा अक्सर अपने भविष्य और करियर की उलझनों में फंसे होते हैं, उस उम्र में बिट्टू ने मरती हुई अजनार नदी को नया जीवन देने का बीड़ा उठाया।
हाथों में फावड़ा और मन में जुनून
बिट्टू की यह कहानी किसी सरकारी प्रोजेक्ट या भारी मशीनों के शोर से शुरू नहीं हुई। इसकी शुरुआत हुई एक युवक की खामोश जिद से। बिट्टू ने जब अजनार नदी के किनारे जमा कचरे और गंदगी को देखा, तो उन्होंने इसे साफ करने का फैसला किया। उनके पास न तो कोई बड़ी टीम थी और न ही सरकारी फंड। उन्होंने अकेले ही अपने हाथों से नदी की सफाई शुरू की। कीचड़, प्लास्टिक और बरसों से जमा गंदगी को वह घंटों तक अकेले साफ करते रहे।

सोशल मीडिया के तानों से ‘सलाम’ तक का सफर
शुरुआत में बिट्टू के इस काम को लोगों ने संदेह की नजर से देखा। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों और वीडियो को कुछ लोगों ने ‘दिखावा’ और ‘लाइक्स’ पाने का जरिया बताया। लेकिन बिट्टू इन आलोचनाओं से विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने काम को ही अपना जवाब बनाया। धीरे-धीरे जब नदी का पानी साफ होने लगा और किनारों की रंगत बदली, तो वही आलोचक उनकी सराहना करने पर मजबूर हो गए।
आनंद महिंद्रा भी हुए मुरीद
बिट्टू के समर्पण की गूँज जब सोशल मीडिया के जरिए दिग्गज उद्योगपति आनंद महिंद्रा तक पहुंची, तो उन्होंने भी इस युवा की तारीफ में कसीदे पढ़े। आनंद महिंद्रा द्वारा बिट्टू के प्रयासों को सराहे जाने के बाद उनकी कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। बिट्टू के लिए यह काम केवल सफाई का अभियान नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव है। उनका कहना है कि साफ पानी की कल-कल सुनना ही उनके जीवन का सबसे सुखद पल होता है।

मजबूत इरादों की जीत
आज बिट्टू तबाही की यह कोशिश बताती है कि बड़े सामाजिक बदलाव के लिए हमेशा करोड़ों के बजट की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक अकेला व्यक्ति भी, जिसके पास संसाधनों के नाम पर सिर्फ मजबूत इच्छाशक्ति हो, वह भी ‘भगीरथ’ बन सकता है। बिट्टू की कहानी उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो व्यवस्था को कोसने के बजाय उसे सुधारने के लिए खुद आगे बढ़ने का साहस रखते हैं।

