पूर्णिया। न्यूजस्टिच
कटिहार जिले के मनिहारी के एक बेहद साधारण किसान परिवार में जन्मे डॉ. तारकेश्वर का बचपन अभावों की उन परतों के बीच बीता। जिसकी कल्पना आज के दौर में मुश्किल है। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि स्कूल जाने के लिए पैरों में चप्पल तक नसीब नहीं थी। डॉ.तारकेश्वर पुरानी यादों को साझा करते हुए भावुक होकर बताते हैं कि एक वक्त ऐसा था जब मेरे पास चप्पल खरीदने के पैसे नहीं थे। तब मेरी माँ ने बोरे (टाट) के टुकड़ों को सिलकर मेरे लिए चप्पल बनाई थी। समाज के तानों के बीच मैं उन्हीं बोरे की चप्पलों को पहनकर स्कूल जाता था। पिता खेत में पसीना बहाते थे और उनकी फटी कमीज बेटे को हर दिन यह याद दिलाती थी कि उसे इस गरीबी के चक्रव्यूह को तोड़ना है।
पिता का सपना और IGIMS तक का सफर
एक साधारण किसान पिता की आँखों में बस एक ही ख्वाहिश थी—उनका बेटा डॉक्टर बने और समाज की सेवा करे। पिता की इसी उम्मीद को तारकेश्वर ने अपनी ‘जिद्द’ बना लिया। बिना किसी आधुनिक सुख-सुविधा के, ढिबरी की रोशनी में पढ़कर उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर बिहार के प्रतिष्ठित संस्थान IGIMS (पटना) में दाखिला लिया। यह सफलता केवल उनकी नहीं, बल्कि उस पिता की थी जिसने खुद भूखा रहकर बेटे की किताबों का इंतजाम किया था।
पूर्णिया के ‘₹100 वाले मसीहा’
आज के दौर में जहां मेडिकल क्षेत्र में फीस की कोई सीमा नहीं है, वहीं डॉ. तारकेश्वर पूर्णिया में ‘राम चरित्र यादव मल्टी स्पेशलिस्ट अस्पताल’ के डायरेक्टर के रूप में एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। डॉक्टरी की डिग्री मिलने के बाद उन्होंने बड़े शहरों के आलीशान अस्पतालों के बजाय अपने क्षेत्र के गरीबों की सेवा को चुना। वे आज भी महज ₹100 फीस लेकर मरीजों का इलाज करते हैं। उनका संकल्प स्पष्ट है कि मैं उस संघर्ष से निकलकर आया हूं। जहां पैसे की कमी के कारण लोग इलाज नहीं करा पाते। मैं नहीं चाहता कि कोई भी गरीब इलाज के अभाव में दम तोड़े।
युवाओं के लिए प्रेरणा: गरीबी बहाना नहीं है
डॉ. तारकेश्वर की कहानी साबित करती है कि सफलता सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। उनके अनुसार, उनके पिता ने अपनी गरीबी के बावजूद उन्हें इस काबिल बनाया, इसलिए अब उनका फर्ज है कि वे समाज का कर्ज उतारें। आज वे केवल एक डॉक्टर नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण हैं जो संसाधनों की कमी को अपनी असफलता का बहाना मानते हैं। डॉ. तारकेश्वर ने दिखा दिया कि अगर हौसले फौलादी हों, तो बोरे की चप्पल पहनकर भी कामयाबी के शिखर को छुआ जा सकता है।

