जिसे कभी अपनी शारीरिक मेहनत और जुझारूपन के लिए जाना जाता था, आज एक नई और अदृश्य बीमारी की गिरफ्त में है। विश्व मोटापा दिवस के मौके पर एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया (API), बिहार चैप्टर ने जो आंकड़े और चेतावनियां जारी की हैं। वे चौंकाने वाली हैं। डॉक्टरों के अनुसार बिहार में मोटापा अब ‘साइलेंट किलर’ बनकर घरों में प्रवेश कर चुका है। इसका सबसे ज्यादा असर उन बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है जो राज्य का भविष्य हैं।
सौंदर्य नहीं, अब यह एक मेडिकल इमरजेंसी
API बिहार के अध्यक्ष डॉ.आर.के.मोदी ने इस मुद्दे पर एक फ्रेश दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि समाज में अब भी मोटापे को संपन्नता या सेहतमंद होने की निशानी माना जाता है। जो एक खतरनाक भ्रम है। हकीकत में मोटापा एक जटिल और दीर्घकालिक बीमारी (Chronic Disease) है। यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को इस कदर बिगाड़ देता है कि व्यक्ति कम उम्र में ही टाइप-2 डायबिटीज, हाइपरटेंशन और फैटी लिवर जैसी बीमारियों का शिकार हो जाता है।
बिहार के युवाओं में क्यों बढ़ रहा है ‘सिटिंग डिजीज’ का खतरा?
सचिव डॉ.धर्मेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि पिछले एक दशक में बिहार की जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है।
डिजिटल सेडेंटरी लाइफ: घंटों मोबाइल और स्क्रीन के सामने बिताना शारीरिक गतिविधियों को शून्य कर रहा है।
फूड कल्चर में बदलाव: सत्तू और पारंपरिक मोटे अनाज की जगह अब ‘इंस्टेंट नूडल्स’ और ‘शुगरी ड्रिंक्स’ ने ले ली है।
तनाव और नींद की कमी: करियर और प्रतिस्पर्धा के दबाव में युवा न तो समय पर सो रहे हैं और न ही संतुलित आहार ले पा रहे हैं।
डॉक्टरों की ’30-45′ वाली संजीवनी
मोटापे के खिलाफ इस जंग में डॉक्टरों ने एक सीधा फॉर्मूला दिया है। यदि बिहार के लोग अपनी दिनचर्या में 30 से 45 मिनट का सक्रिय व्यायाम (तेज चलना, दौड़ना या योग) शामिल कर लें, तो हृदय रोगों और कैंसर के खतरे को 40% तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा, डॉक्टरों ने ‘थाली के संतुलन’ पर जोर देते हुए प्रोसेस्ड शुगर और जंक फूड को पूरी तरह त्यागने की अपील की है।
आज की आदत, कल की सेहत
डॉ.मोदी का संदेश स्पष्ट है कि मोटापा कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि एक जीवनशैली जनित विकार है जिसे सही जानकारी और अनुशासन से हराया जा सकता है। भविष्य में बड़ी मेडिकल सर्जरी और दवाओं के बोझ से बचने के लिए आज ही अपनी आदतों को बदलना अनिवार्य है।

