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डर्टी फ्यूल प्लान! ऑस्ट्रेलिया ने दी तेल में SULPHUR की मात्रा बढ़ाने की अनुमति, होगा ये नुकसान

ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी भीषण युद्ध ने दुनिया भर की ऊर्जा सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है। इस संकट के बीच ऑस्ट्रेलिया ने एक आपातकालीन कदम उठाते हुए अपने ईंधन गुणवत्ता मानकों (Fuel Quality Standards) को अस्थायी रूप से कम करने का निर्णय लिया है। ऊर्जा मंत्री क्रिस बोवेन ने स्पष्ट किया कि वैश्विक तेल आपूर्ति में आई बाधा और कीमतों में उछाल के कारण यह “कड़वा फैसला” लेना जरूरी हो गया है।

ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने अगले 60 दिनों के लिए ईंधन में सल्फर (Sulphur) की मात्रा बढ़ाने की अनुमति दे दी है। आमतौर पर उच्च सल्फर वाला ईंधन पर्यावरण के लिए अधिक हानिकारक माना जाता है और इसे ‘डर्टी फ्यूल’ (Dirty Fuel) कहा जाता है।

  • सप्लाई में बढ़ोत्तरी: अधिकारियों का मानना है कि मानकों में इस ढील से हर महीने बाजार में अतिरिक्त 10 करोड़ लीटर ईंधन उपलब्ध हो सकेगा।
  • दबाव कम करने की कोशिश: इस कदम का उद्देश्य बाजार में तेल की किल्लत को रोकना और आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाना है।

ऊर्जा मंत्री क्रिस बोवेन ने बताया कि कैनबरा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency – IEA) के साथ भी संपर्क में है। दुनिया भर में तेल के भंडार (Strategic Reserves) को बाजार में उतारने पर चर्चा हो रही है। बोवेन ने साफ किया कि ऑस्ट्रेलिया जो भी योगदान देगा, वह उसके अपने घरेलू बाजार की सुरक्षा के लिए ही होगा।

ऑस्ट्रेलिया सरकार के इस फैसले की पर्यावरणविदों ने आलोचना शुरू कर दी है। अधिक सल्फर वाले तेल के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण बढ़ने का खतरा है। हालांकि, सरकार का तर्क है कि यदि यह कदम नहीं उठाया गया तो देश की परिवहन व्यवस्था और सप्लाई चेन पूरी तरह ठप हो सकती है।

ऑस्ट्रेलिया का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि मिडिल ईस्ट की जंग अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रही। भारत में भी एयर इंडिया द्वारा लगाया गया ‘फ्यूल सरचार्ज’ और अब ऑस्ट्रेलिया में तेल मानकों में कटौती, यह दर्शाती है कि दुनिया एक बड़े ‘ऑयल शॉक’ की गिरफ्त में है।

युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में अन्य देश भी इसी तरह के कड़े और अलोकप्रिय फैसले लेने पर मजबूर हो सकते हैं। फिलहाल, ऑस्ट्रेलिया ने अपनी अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए पर्यावरण के मानकों से समझौता करने का रास्ता चुना है।

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