डेस्क। न्यूजस्टिच
जब हाल ही में दिल्ली के AI समिट में एक रोबोटिक डॉग को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तो उंगलियां सीधे एक नाम पर उठीं सुनील गलगोटिया। आज हजारों करोड़ के टर्नओवर और आलीशान कैंपस के मालिक सुनील गलगोटिया का इतिहास जितना प्रेरणादायक है, उनका वर्तमान उतना ही चुनौतीपूर्ण।
कनॉट प्लेस की वो छोटी सी दुकान
सुनील गलगोटिया के साम्राज्य की जड़ें 1930 के दशक में दिल्ली के दिल, कनॉट प्लेस (CP) की एक छोटी सी किताबों की दुकान में छिपी हैं। उनके परिवार का पब्लिशिंग का पुराना काम था। दिल्ली के प्रतिष्ठित श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) से स्नातक करने के बाद, सुनील ने इसी विरासत को आगे बढ़ाया। 1980 के दशक में ‘गलगोटियास पब्लिकेशंस’ के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीकी किताबों के वितरण अधिकार हासिल किए, जिसने उनके भविष्य की नींव रखी।
महज 40 छात्रों से शुरू हुआ ‘एजुकेशन टाइकून’ का सफर
शिक्षा जगत में उनकी असली उड़ान साल 2000 में शुरू हुई। उन्होंने गलगोटियास इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (GIMT) की स्थापना की। दिलचस्प बात यह है कि उस वक्त संस्थान में केवल 40 छात्र थे। 2000-2010: इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेजों के जरिए अपनी साख बनाई। 2011: उत्तर प्रदेश सरकार से यूनिवर्सिटी का दर्जा हासिल किया। 52 एकड़ का कैंपस और हजारों छात्रों की भीड़, जो इस ग्रुप को देश के सबसे बड़े निजी शैक्षणिक समूहों में खड़ा करती है।
विरासत बनाम विवाद: एक नई चुनौती
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुनील गलगोटिया का कारोबार आज हजारों करोड़ का है। लेकिन, हालिया ‘रोबोटिक डॉग’ विवाद और सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी की छवि को लेकर उठ रहे सवालों ने इस कामयाबी पर एक ‘सस्पेंस’ खड़ा कर दिया है। आलोचक सवाल पूछ रहे हैं कि क्या “किताबों की दुनिया” से आए एक दूरदर्शी व्यक्ति के नेतृत्व में संस्थान ‘नवाचार’ (Innovation) के नाम पर केवल ‘मार्केटिंग’ का सहारा ले रहा है?
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा (दनकौर) में यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। साल 2011 में अपनी स्थापना के बाद से इस विश्वविद्यालय ने शिक्षा जगत में एक बड़ी पहचान बनाई है। लेकिन हाल के दिनों में, यह संस्थान अपनी शैक्षणिक उपलब्धियों से ज्यादा अपने विवादों, विशेषकर ‘हाई-टेक’ दावों की पोल खुलने के कारण चर्चा का केंद्र बन गया है।
स्थापना का आधार और विस्तार
गलगोटिया एजुकेशनल ग्रुप की नींव सुनील गलगोटिया ने रखी थी। शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखने से पहले प्रकाशन जगत में सक्रिय रहे सुनील गलगोटिया ने साल 2000 में प्रबंधन और इंजीनियरिंग कॉलेजों की शुरुआत की। इन संस्थानों की सफलता ने उन्हें 2011 में एक पूर्ण विश्वविद्यालय स्थापित करने का हौसला दिया।आज 52 एकड़ में फैला यह आधुनिक कैंपस 200 से अधिक पाठ्यक्रमों का संचालन करता है। स्मार्ट क्लासरूम, अत्याधुनिक लैब और लाइब्रेरी के साथ यह बी.टेक, एमबीए, और लॉ जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए छात्रों की पहली पसंद बना रहा है। यूजीसी से मान्यता प्राप्त इस यूनिवर्सिटी ने हजारों छात्रों को करियर के अवसर प्रदान किए हैं।
AI समिट 2026: जब ‘स्वदेशी’ दावे पर उठे सवाल
यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठा को सबसे बड़ा झटका हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित ‘India AI Impact Summit 2026’ के दौरान लगा। यूनिवर्सिटी ने अपने ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक रोबोटिक डॉग, जिसका नाम उन्होंने “ओरियल” (Orion) रखा था, पेश किया। दावा किया गया कि यह रोबोट यूनिवर्सिटी के अपने शोध और विकास का परिणाम है। लेकिन, टेक एक्सपर्ट्स और सोशल मीडिया की पैनी नजरों से यह ज्यादा देर छिप नहीं सका। जांच में पाया गया कि “ओरियल” असल में चीन की मशहूर रोबोटिक्स कंपनी का ‘Unitree Go2’ मॉडल है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से उपलब्ध है।
इस घटना के बाद एक्सपो में हंगामा मच गया और अधिकारियों ने यूनिवर्सिटी को अपना स्टॉल हटाने का निर्देश दिया। आलोचकों ने इसे “बौद्धिक बेईमानी” करार दिया। हालांकि, यूनिवर्सिटी ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि यह केवल एक “गलतफहमी” थी और उन्होंने कभी भी इसे पूरी तरह से अपना निर्माण होने का दावा नहीं किया था। लेकिन तब तक यूनिवर्सिटी की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े हो चुके थे।
विवादों का पुराना नाता
यह पहली बार नहीं है जब गलगोटिया यूनिवर्सिटी सुर्खियों में आई हो। इससे पहले भी फीस संरचना, छात्र प्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर होने वाली नारेबाजी को लेकर यूनिवर्सिटी चर्चा में रही है। कई बार छात्रों ने प्रशासन पर मनमानी फीस वसूलने और सुविधाओं के अभाव के आरोप लगाए हैं। हालिया ‘फेक रोबोट’ विवाद ने इन पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है, जिससे संस्थान की विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ा है।
साख बचाने की चुनौती
एक निजी विश्वविद्यालय के रूप में गलगोटिया ने निश्चित रूप से बुनियादी ढांचे और प्लेसमेंट के क्षेत्र में काम किया है। लेकिन, तकनीकी दावों की सत्यता और पारदर्शिता की कमी ने इसकी छवि को धूमिल किया है। किसी भी शिक्षण संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी उसकी ‘साख’ और ‘सत्यनिष्ठा’ होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गलगोटिया यूनिवर्सिटी को एक गंभीर वैश्विक शैक्षणिक संस्थान के रूप में अपनी पहचान बनाए रखनी है, तो उसे भविष्य में ऐसे दावों से बचना होगा जो केवल मार्केटिंग के लिए हों और धरातल पर शून्य हों।

