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काशी विश्वनाथ मंदिर के तर्ज पर बिहार में इस मंदिर को किया जाएगा विकसित, सरकार ने जारी किया फंड

विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला (हरिहर क्षेत्र मेला) केवल पशुओं की खरीद-बिक्री का केंद्र नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म के दो सबसे बड़े संप्रदायों शैव और वैष्णव के मिलन का प्रतीक है। सम्राट सरकार ने राज्य के इस धार्मिक पर्यटन क्षेत्र को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने के लिए मिशन मोड में काम कर शुरू कर दिया है। राज्य सरकार ने सोनपुर स्थित बाबा हरिहरनाथ मंदिर को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर विकसित करने का निर्णय लिया है। इसके लिए सरकार ने भारी-भरकम बजट भी आवंटित कर दिया है। राज्य में पहली बार सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर्यटन हरिहरनाथ मंदिर के डेवल्पमेंट के लिए 682 करोड़ रुपए का फंड जारी कर दिया है।

कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होने वाले इस एक माह के मेले के पीछे एक अत्यंत प्राचीन और रोचक पौराणिक कथा छिपी है, जिसका वर्णन ‘पद्ममातांज्जलि’ ग्रंथ में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि गौतम के आश्रम में एक समय दैत्य राज वृषपर्वा, बाणासुर, कुल गुरु शुक्राचार्य और भक्त शिरोमणि प्रह्लाद अतिथि के रूप में रुके थे। वृषपर्वा भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। एक दिन जब वे पूजा कर रहे थे, तब महर्षि गौतम के प्रिय शिष्य शंकरात्मा अनजाने में उनके और शिवलिंग के बीच आ गए।
शंकरात्मा की इस अशिष्टता से क्रोधित होकर वृषपर्वा ने तलवार से उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। अपने प्रिय शिष्य की मृत्यु देख महर्षि गौतम ने योग बल से देह त्याग दी। इसके बाद ग्लानि और दुख में शुक्राचार्य सहित कई अन्य अतिथियों ने भी प्राण त्याग दिए। देखते ही देखते आश्रम शिव भक्तों के शवों से भर गया।

महर्षि गौतम की पत्नी माता अहिल्या के विलाप पर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने अपनी कृपा से महर्षि गौतम समेत सभी को पुनर्जीवित कर दिया। इसी दौरान भक्त प्रह्लाद की पुकार पर भगवान विष्णु भी वहां पहुंच गए। माता अहिल्या ने दोनों देवों से आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह किया और उनके लिए भोजन बनाने चली गईं।

भोजन तैयार होने में विलंब देख भगवान शिव और विष्णु आश्रम के समीप बहने वाली सरयू नदी में स्नान करने चले गए। वहां दोनों देव बालक की भांति जलक्रीड़ा (पानी में खेलना) करने लगे। खेलते-खेलते दोनों सरयू से नारायणी (गंडक) नदी में पहुंच गए। प्रभु की इस अनुपम लीला को देखने के लिए स्वयं ब्रह्मा जी और अन्य देवता भी नारायणी तट पर आ पहुंचे। इसी क्रीड़ा के दौरान भगवान शिव ने कहा था कि “भगवान विष्णु मुझे माता पार्वती से भी प्रिय हैं।” यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित होकर वहां पहुंची थीं, जिन्हें बाद में महादेव ने शांत कराया। यही कारण है कि नारायणी नदी के तट पर हरि (विष्णु) और हर (शिव) के साथ माता पार्वती भी स्थापित हैं।

मान्यता है कि गौतम स्थान (छपरा) से लेकर सोनपुर तक का पूरा इलाका इसी जलक्रीड़ा के कारण ‘हरिहर क्षेत्र’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान विष्णु (हरि) और शिव (हर) की एक साथ मौजूदगी के कारण यह स्थान शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के लिए परम पूजनीय बन गया।

सदियों से इसी पावन भूमि पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर विशाल मेला लगता आ रहा है। कभी यह मेला केवल ‘विश्व प्रसिद्ध पशु मेला’ के रूप में जाना जाता था, जहाँ हाथियों से लेकर घोड़ों तक का विशाल बाजार सजता था। लेकिन समय के साथ बिहार सरकार और पर्यटन विभाग ने इसे और आकर्षक बनाया है। अब यहाँ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ आधुनिक कला, संस्कृति और व्यापार का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।