डेस्क । न्यूजस्टिच
मध्य पूर्व में जारी विनाशकारी युद्ध को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान की धरती एक बार फिर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक मेज बनने जा रही है। इस्लामाबाद टॉक्स के पहले दौर के बेनतीजा रहने के बाद, अब दूसरे दौर की बातचीत की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। दो वरिष्ठ सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता के लिए सुरक्षा और व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जा रहा है।
ट्रंप का सकारात्मक संकेत, पर तारीखों में बदलाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को इस बात के संकेत दिए थे कि अगले दो दिनों के भीतर पाकिस्तान में बातचीत दोबारा शुरू हो सकती है। हालांकि, कूटनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, यह बैठक इस सप्ताह के अंत में या अगले सप्ताह की शुरुआत में हो सकती है।
सूत्रों का कहना है कि इस्लामाबाद का वही आलीशान होटल एक बार फिर इन ऐतिहासिक वार्ताओं का गवाह बनेगा, जिसने पहले दौर की मेजबानी की थी। इस बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कलीबाफ के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडलों के शामिल होने की पूरी संभावना है।
शहबाज शरीफ के दौरे से जुड़ा है ‘हाई-लेवल’ मीटिंग का पेंच
भले ही राष्ट्रपति ट्रंप जल्द बातचीत चाहते हों, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार फिलहाल सऊदी अरब, कतर और तुर्की के दौरे पर हैं। वे शनिवार तक स्वदेश लौटेंगे। ऐसे में उच्च स्तरीय वार्ता से पहले दोनों देशों के निम्न-स्तरीय अधिकारियों के बीच जमीन तैयार करने के लिए प्रारंभिक दौर की बातचीत हो सकती है।
युद्ध की विभीषिका के बीच 8 अप्रैल का सीजफायर
यह वार्ता उस समय हो रही है जब 28 फरवरी से शुरू हुए इस भीषण युद्ध ने मध्य पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति और आम जनजीवन को तबाह कर दिया है। आंकड़ों के मुताबिक:
- इस 39 दिनों के युद्ध में ईरान में लगभग 3,300 लोगों की जान गई है।
- 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है और सैकड़ों घायल हुए हैं।
- पाकिस्तान की मध्यस्थता में 8 अप्रैल को हुआ दो सप्ताह का युद्धविराम फिलहाल लागू है, जो शांति की उम्मीदों को जिंदा रखे हुए है।
1979 के बाद का सबसे बड़ा कूटनीतिक प्रयास
इस्लामाबाद में हो रही यह सीधी बातचीत 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से वाशिंगटन और तेहरान के बीच सबसे उच्च स्तरीय संपर्क है। दुनिया की निगाहें अब पाकिस्तान पर टिकी हैं कि क्या वह इस युद्धविराम को एक स्थायी शांति समझौते में बदलने में कामयाब हो पाता है या नहीं।

