पटना।न्यूजस्टिच
बिहार की राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले नीतीश कुमार ने भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है। जिसे भेद पाना किसी भी राजनेता के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। 20 नवंबर 2025 को 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर उन्होंने न केवल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता सिद्ध की, बल्कि यह भी दिखाया कि बिहार की सत्ता का केंद्र आज भी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है। वो चारों सदन जाने वाले अनोखी उपलब्धि में शामिल हो गए है।
शून्य से शिखर तक का सफर
नीतीश कुमार का विधिवत मुख्यमंत्री काल 3 मार्च 2000 को शुरू हुआ था। जब वे पहली बार सत्ता के शीर्ष पर बैठे। हालांकि वह कार्यकाल संक्षिप्त रहा, लेकिन 2005 में उनकी दूसरी पारी ने बिहार की दिशा और दशा दोनों बदल दी। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जिस बिहार को जंगलराज के तमगे से नवाजा जाता था, नीतीश कुमार ने सत्ता संभालते ही उसे कानून के राज में तब्दील करने का बीड़ा उठाया। अपराध पर नियंत्रण और प्रशासनिक कसावट की वजह से ही जनता ने उन्हें प्यार से सुशासन बाबू कहना शुरू किया।
विकास के मील के पत्थर
नीतीश कुमार की राजनीति केवल सत्ता के समीकरणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने धरातल पर बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया। उनके शासनकाल की कुछ प्रमुख उपलब्धियां निम्नलिखित हैं।
अवसंरचना का विकास
बिहार के कोने-कोने को जोड़ने के लिए सड़कों और पुलों का जाल बिछाया गया, जिससे राज्य की कनेक्टिविटी में क्रांतिकारी बदलाव आया।
सशक्तिकरण का मॉडल
मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ ने न केवल स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या कम की, बल्कि समाज में उनकी गतिशीलता और आत्मविश्वास को भी बढ़ाया।
आधी आबादी को हक
पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण और सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण देकर उन्होंने बिहार में एक मौन सामाजिक क्रांति का नेतृत्व किया।
हर घर तक बुनियादी सुविधा
‘सात निश्चय’ योजना के तहत हर घर नल का जल, शौचालय निर्माण और बिजली की पहुँच सुनिश्चित कर उन्होंने ग्रामीण बिहार की जीवनशैली बदल दी।
सामाजिक सुधार
अप्रैल 2016 में पूर्ण शराबबंदी का साहसी फैसला लेकर उन्होंने घरेलू हिंसा में कमी और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में बड़ा कदम उठाया।
सोशल इंजीनियरिंग के माहिर खिलाड़ी
नीतीश कुमार की सफलता का एक बड़ा राज उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ रही है। उन्होंने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े अति पिछड़ों (EBC) और महादलितों को एक नई राजनीतिक पहचान दी। इन वर्गों को मुख्यधारा में जोड़कर उन्होंने एक ऐसा मजबूत वोट बैंक तैयार किया, जिसने गठबंधन बदलते रहने के बावजूद उनकी कुर्सी को मजबूती प्रदान की।
दशकों का अटूट विश्वास, 10 शपथों का लेखा-जोखा
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव और गठबंधन के बदलते स्वरूपों का गवाह रहा है। 2000 से लेकर 2025 तक, उन्होंने कुल 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। चाहे वह 2015 का महागठबंधन हो या एनडीए के साथ उनका पुराना नाता, नीतीश कुमार ने हर परिस्थिति में खुद को बिहार के लिए अपरिहार्य बनाए रखा। 20 नवंबर, 2025 की उनकी हालिया शपथ उनके दीर्घकालिक राजनीतिक कौशल और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का प्रमाण है। कुल मिलाकर नीतीश कुमार का राजनीतिक जीवन विकासवाद और सामाजिक न्याय के अद्भुत संतुलन की कहानी है। विवादों और राजनीतिक गठबंधन बदलने के आरोपों के बीच भी, उनकी ‘क्लीन इमेज’ और प्रशासनिक क्षमता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है। 2026 के इस दौर में भी, बिहार की राजनीति का हर रास्ता नीतीश कुमार के बंगले से ही होकर गुजरता है।

