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रसोई गैस की किल्लत ,छात्रों के सामने समस्या पढ़ाई करें या गैस की तलाश, घर-वापसी बनी मजबूरी

एक अदद सरकारी नौकरी की तलाश में अपने घरों से 60-100 किमी दूर पूर्णियां के प्राइवेट लॉज में 10×10 के सीलन भरे कमरे में रहे हजारों छात्रों को अपने भविष्य की चिंता सता रही है। निम्न मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले इन छात्रों को बमुश्किल 02 हजार रु प्रतिमाह घर से मिलते हैं वह भी जब दिन-रात खेतों में पसीने बहाने वाले किसान पिता की फसल सही-सलामत बाजार तक पहुंच जाती है। ईरान-इजरायल युद्ध की काली छाया से ये छात्र भी अछूते नही हैं और रसोई गैस की किल्लत की वजह से इनके सपनो पर ग्रहण लग रहे हैं। इनका कमरा ही शयन कक्ष, स्टडी -रूम और रसोई घर होता है जहां अब चूल्हे की लौ धीमी पड़ चुकी है। आगे अधिकांश छात्रों की परीक्षा है तो दूसरी ओर गैस की किल्लत से दोनों वक्त के भोजन पर ग्रहण लग चुका है। इनके साथ समस्या यह है कि स्थानीय निवासी नही होने की वजह से इन्हें गैस एजेंसी अपना उपभोक्ता नही बना सकती है। लिहाज़ा इन्हें रसोई गैस के लिए कालाबाजार पर निर्भर रहना पड़ता है। कल तक जो गैस 80 रु किलो में उपलब्ध हो जाती थी वह काफी जद्दोजहद के बाद 200-250 रु किलो में मिल पाती है, जो इन छात्रों के बजट से दूर होता है। बड़ी संख्या में छात्र वापस अपने गांव लौट चुके हैं और जिन छात्रों की आगे परीक्षा है वे भी परीक्षा के बाद अपने घर की वापसी के लिए मन बना चुके हैं। जाहिर है, इन छात्रों के सपनो की उड़ान पर मिसाइल और फाइटर जेट की उड़ान भारी साबित हो रही है।

छात्र जीवन मुफलिसी का दौर होता है जहां लक्ष्य हासिल करने के लिए कई तरह के समझौते करने होते हैं। प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे आनंद कुमार कहते हैं कि गैस की किल्लत से काफी परेशानी होती है। इसपर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। मन की बात तो ठीक है,जन की बात भी होनी चाहिए। गैस की चिंता की वजह से पढ़ाई पर फोकस नही कर पा रहे हैं। आपदा में आनंद जैसे छात्रों ने विकल्प भी तलाश लिया है, अब वे शॉर्ट-कट मेन्यू का सहारा ले रहे हैं। शॉर्ट-कट का मतलब यह होता है कि एक ही प्रेशर कुकर में चावल, दाल और आलू डाल दिया जो एक साथ बन जाता है और गैस की बचत होती है। इस प्रकार चावल दाल और आलू का चोखा तैयार हो जाता है जो छात्रों के बीच काफी प्रचलित मेन्यू होता है।

मिथिलांचल से लेकर कोसी-सीमांचल के इलाके में नाश्ते के रूप में दही-चूड़ा काफी प्रचलित है। लेकिन, यही दही-चूड़ा छात्रों के बीच रात के भोजन के विकल्प के रूप में तेजी से सामने आया है। छात्र सुनील सुमन कहते हैं कि गैस तो मिलता है लेकिन काफी महंगा मिलता है जो खरीद पाना कठिन है.ऐसे में दिन में भोजन बनाते हैं तो रात में दही-चूड़ा खाकर  सो जाते हैं। जबकि सुमन के रूम मेट सौरभ कहते हैं कि 200-250 रु किलो गैस लेना एफर्ट नही कर पा रहे हैं, इसलिए विकल्प तो तलाशना ही होगा।

एलपीजी गैस के विकल्प के रूप में बिजली इंडक्शन की बिक्री तेज हुई है। लेकिन इसकी कीमत कम से कम 02 हजार रु है ऐसे में हर छात्र के लिए इसे खरीदना आसान नही है। छात्र अंकित अमन अपने पढ़ाई के साथ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते हैं, लिहाज़ा इंडक्शन खरीदने में सफल रहे। अंकित कहते हैं कि गैस को लेकर बड़ी दिक्कत है। बहुत सारे छात्र घर चले गए हैं। हमलोगों की आगे परीक्षा है तो रुके हुए है और ब्लैक में ही गैस खरीदते हैं। इसलिए इलेक्ट्रिक इंडक्शन खरीद लिए हैं। अगर प्रॉब्लम सॉल्व नही हुआ तो घर जाना पड़ेगा। क्योंकि, इंडक्शन पर रोटी नही पक सकता है, सुबह शाम चावल ही खाना पड़ता है.

घर से दूर रह रहे छात्रों के पिता को बेटे की पढ़ाई की प्रगति की चिंता रहती है तो हर मां को इस बात की चिंता रहती है कि बेटे ने खाना खाया है या नही। गैस की किल्लत से रूबरू हो रहे अधिकांश छात्रों को वापस अपने घर लौट जाने का फरमान मिल चुका है। छात्र अभिषेक कुमार कहते हैं कि आगे एग्जाम है। इसलिए रुके हुए हैं। घर से वापस आने के लिए बोल दिया गया है। गैस ब्लैक से भी बड़ी मुश्किल में मिल रहा है। परीक्षा की तैयारी करें या गैस सिलिंडर लेकर बाजार घूमें !

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