कहते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों, तो हाथ की मिट्टी भी सोना उगलने लगती है। बिहार के समस्तीपुर जिले के दलसिंहसराय की रहने वाली अंजू देवी ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली अंजू देवी आज देश की उन चुनिंदा महिला किसानों में शामिल हैं, जिन्होंने खेती को स्वावलंबन और सम्मान का ग्लोबल जरिया बना दिया है।
बर्दाश्त किए ताने, फिर पट्टे की जमीन से बदली किस्मत
अंजू देवी का सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने पहली बार हाथ में खुरपी पकड़ी, तो समाज ने उन्हें ताने दिए— “महिला है, खेत में क्या ही उखाड़ लेगी?” लेकिन अंजू ने जवाब देने के बजाय मेहनत का रास्ता चुना। उन्होंने महज एक कट्ठा पट्टे (किराए) की जमीन से संघर्ष शुरू किया था। आज उनके पास अपनी डेढ़ एकड़ जमीन है और वे कुल ढाई एकड़ में जैविक खेती (Organic Farming) कर रही हैं।
‘मड़ुआ’ से लेकर ‘ऑर्गेनिक ऑयल’ तक का सफर
अंजू देवी केवल फसलें नहीं उगातीं, बल्कि उन्होंने ‘खेत से प्लेट तक’ के मंत्र को अपना आधार बनाया है। उन्होंने पारंपरिक अनाज जैसे ‘मड़ुआ’ (रागी) के औषधीय गुणों को समझा और इससे अलग-अलग खाद्य उत्पाद तैयार कर बाजार में अपनी पहचान बनाई। उनके द्वारा तैयार किए गए ‘खाद्य तेल’ और देसी बीजों के संरक्षण के काम की चमक इतनी फैली कि इसकी गूंज दिल्ली के राष्ट्रपति भवन तक पहुँची।
फ्रांस और इटली में सिखाए खेती के गुर
अंजू देवी आज केवल समस्तीपुर की पहचान नहीं हैं, बल्कि वे एक वैश्विक कृषि विशेषज्ञ बन चुकी हैं। बीजों के संरक्षण और जैविक खेती की उनकी तकनीक को देखने-समझने के लिए उन्हें फ्रांस, इटली और काठमांडू जैसे देशों से आमंत्रण मिले, जहाँ उन्होंने भारतीय कृषि का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित होने वाली अंजू देवी अब खुद बीजों का ट्रायल करती हैं और सफल होने पर ही उन्हें दूसरे किसानों तक पहुँचाती हैं।
जहानाबाद में साझा किए अनुभव
हाल ही में जहानाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में अंजू देवी ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सेहत और स्वावलंबन की नींव है। उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वे खेतों की कमान संभालें और अपनी पहचान खुद बनाएँ।

