वर्तमान समय में जहाँ पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के विनाशकारी प्रभावों से लड़ रही है, वहीं भारत की जनजातीय संस्कृति का महान पर्व सरहुल हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने का शाश्वत संदेश दे रहा है। सरहुल केवल नाचने-गाने या उत्सव मनाने का नाम नहीं है, बल्कि यह धरती के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने का महापर्व है। उक्त बातें पूर्णिया के सुप्रसिद्ध सर्जन और ग्रीन पूर्णिया के संस्थापक डॉ. अनिल कुमार गुप्ता ने कही हैं।

प्रकृति और मानव का अटूट रिश्ता
सरहुल का शाब्दिक अर्थ है-सखुआ की पूजा। चैत्र महीने की शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह त्योहार उस समय आता है जब पेड़ों पर नए पत्ते और फूल आते हैं। जनजातीय समाज मानता है कि प्रकृति ही उनका पालनहार है। इस दिन साल (सखुआ) के वृक्ष की पूजा करना यह दर्शाता है कि मानव जीवन वनस्पति जगत पर निर्भर है। आज जब हम कंक्रीट के जंगल बना रहे हैं, सरहुल हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें मिट्टी और जंगलों में हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के दौर में सरहुल की प्रासंगिकता
आज ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऋतु चक्र बदल गया है। समय से पहले गर्मी पड़ना और अनियंत्रित वर्षा ने कृषि और जीवन को संकट में डाल दिया है। ऐसे में सरहुल की परंपराएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं:
- जल संरक्षण का संदेश: सरहुल के दौरान घड़े के पानी को देखकर वर्षा का पूर्वानुमान लगाने की परंपरा जल के महत्व को रेखांकित करती है।
- जैव विविधता का सम्मान: यह पर्व सिखाता है कि हम प्रकृति से केवल उतना ही लें जितना आवश्यक है। आदिम संस्कृति में पेड़ों को काटना वर्जित माना गया है, जो आज के समय में ‘कार्बन उत्सर्जन’ कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
- मिट्टी से जुड़ाव: रासायनिक खादों के युग में, सरहुल हमें मिट्टी की शुद्धता बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
भविष्य के लिए चेतावनी और सीख
ग्लोबल वार्मिंग केवल वैज्ञानिक चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व का संकट है। सरहुल पर्व यह संदेश देता है कि यदि हम सखुआ के पेड़ों और पहाड़ों को नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को ऑक्सीजन और पानी के लिए तरसना होगा।
यदि हम सरहुल के मूल दर्शन-प्रकृति की रक्षा, हमारी रक्षा को अपना लें, तो ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक चुनौतियों का सामना करना सरल हो जाएगा। यह समय केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि सरहुल की भावना को आत्मसात कर अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने और जंगलों को बचाने का है।

