मध्य पूर्व में जारी ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के सामने अब तक का सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने दुनिया को बताया कि अमेरिका और इरान की बीच चली जंग में कितने ऑयल प्लांट तबाह हुए हैं। उन्होंने बताया कि इस युद्ध में अब तक ईरान के 80 से अधिक तेल और गैस प्रतिष्ठान पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इन ठिकानों में बड़े उत्पादन स्थल, तेल टर्मिनल और महत्वपूर्ण रिफाइनरियां शामिल हैं।
ऊर्जा ठिकानों पर भीषण प्रहार
फातिह बिरोल के अनुसार, तेल बुनियादी ढांचे पर हुए इन हमलों ने वैश्विक आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) को बुरी तरह प्रभावित किया है। ईरान, जो दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है, के रिफाइनिंग और एक्सपोर्ट क्षमता को निशाना बनाने से बाजार में कच्चे तेल की भारी किल्लत महसूस की जा रही है। बिरोल ने चेतावनी दी है कि यदि बुनियादी ढांचे को होने वाला यह नुकसान इसी तरह जारी रहा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।
तेल की कीमतों में लगी आग: $100 प्रति बैरल का डर
आपूर्ति बाधित होने की खबरों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों ने पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें 94 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर के बेहद करीब पहुंच गई हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में कीमतें 110 डॉलर के स्तर को भी पार कर सकती हैं, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल और महंगाई दर बढ़ने की आशंका है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नाकेबंदी
संकट को और गहरा करने में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर बढ़ता तनाव प्रमुख भूमिका निभा रहा है। अमेरिका ने रणनीतिक कदम उठाते हुए इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपनी नाकेबंदी सख्त कर दी है। ज्ञात हो कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी संकीर्ण रास्ते से होकर गुजरता है। अमेरिकी सैन्य उपस्थिति और प्रतिबंधों ने ईरानी तेल के निर्यात को पूरी तरह ठप करने की कोशिश की है, जिससे वैश्विक बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है।
आगे क्या?
IEA प्रमुख ने वैश्विक शक्तियों से शांति की अपील की है ताकि तेल बुनियादी ढांचों की मरम्मत की जा सके। फिलहाल, अमेरिका की सख्त नाकेबंदी और ईरान के क्षतिग्रस्त होते प्लांट ने पूरी दुनिया को एक बड़े ‘एनर्जी क्राइसिस’ की ओर धकेल दिया है, जिसका असर एशिया से लेकर यूरोप तक दिखने लगा है।

