एक कमरे का घर और टीन की छत के अलावा पिता के दो बैल और उनकी बैलगाड़ी जब आपके पास यही कुल जमापूंजी हो तो किसी का भी हौसला जवाब दे जाता है। मगर कसबा के एक बच्चे ने अपने पिता की आर्थिक तंगी को अपने राह का रोड़ा बनने नहीं दिया। उसने वो कर दिखाया जिसकी तम्मना हर मां-बाप को होती है। मुश्किलों को पार कर सीमांचल ही नहीं बिहार का प्रसिद्ध सर्जन बनने की यह कहानी उस शख्स की है जो न केवल एक डॉक्टर है बल्कि वह प्रकृतिप्रेमी भी है और राजनेता भी। जी हां, हम बात कर रहे हैं पूर्णिया के मशहूर सर्जन डॉ. अनिल कुमार गुप्ता की। आज न्यूजस्टिच पूर्णिया के उस सफल सर्जन की प्रेरणादायी कहानी लेकर आया है, जिसके घर में कोई व्यक्ति ढंग से पढ़ा लिखा नहीं था। पूरे परिवार में पढ़ी लिखी थी तो मात्र एक मां, जिसने बेटे के अंदर पढ़ने का वो जुनून पैदा किया कि वह आज बिहार का सफल सर्जन बन गया है।
कसबा से पटना तक: टीन की छत और पढ़ाई का जुनून
डॉ. अनिल का जन्म पूर्णिया के कसबा में एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। वह बताते हैं, मेरे पिताजी बैलगाड़ी चलाते थे। हम चार भाई-बहन अपने माता-पिता के साथ एक ही कमरे में रहते थे, जिसकी छत टीन की थी। उस कमरे में केवल हम ही नहीं, बल्कि मिट्टी की कोठी में अनाज का भंडार भी हमारे बिस्तर के पीछे ही रहता था।
मां कसबा में अपने समय की पहली मैट्रिक पास महिला थी
डॉ. गुप्ता की मां अपने समय की पहली मैट्रिक पास महिला थीं, जिन्होंने उनमें शिक्षा के संस्कार बोए। हालांकि वह स्कूल में कभी टॉपर’ नहीं रहे, लेकिन किताबों के प्रति उनके जुनून ने 1976 की मैट्रिक परीक्षा में उन्हें सबसे आगे खड़ा कर दिया। इसी मेहनत के दम पर उन्हें पटना के प्रतिष्ठित साइंस कॉलेज में दाखिला मिला।
पटना की गलियां और गुरु का सानिध्य
पटना में पढ़ाई के दौरान डॉ. गुप्ता ने कई कठिनाइयां झेलीं। न हॉस्टल मिला और न ही रहने को अच्छा कमरा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने जीवन के 19 साल पटना में बिताए। वह अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरु डॉ. नरेंद्र प्रसाद को देते हैं, जिनसे उन्होंने सर्जरी की बारीकियां सीखीं।
लाइन बाजार में एक बेसमेंट में शुरू किया क्लिनिक
1995 में डॉ. अनिल वापस पूर्णिया लौटे और लाइन बाजार में किराए के एक बेसमेंट में अपना क्लिनिक शुरू किया। वह दिन याद करते हुए बताते हैं, “बरसात में बेसमेंट में घुटने भर पानी भर जाता था, लेकिन उसी स्थिति में मरीज भी रहते थे और वहीं हमारा ऑपरेशन थिएटर भी था।” 7-8 साल के कड़े संघर्ष के बाद, 2004 में उन्होंने अपने वर्तमान नर्सिंग होम की स्थापना की।
पूर्णिया में तकनीक की क्रांति: प्रथम लैप्रोस्कोपिक सर्जन
1998 में डॉ. अनिल गुप्ता ने पूर्णिया में पहली बार लैप्रोस्कोपिक सर्जरी (दूरबीन विधि) की शुरुआत की। उस समय पूरे नॉर्थ-ईस्ट बिहार में यह तकनीक किसी के पास नहीं थी। आधुनिकता के प्रति उनका लगाव यहीं नहीं रुका; उन्होंने पूर्णिया को पहली बार MRI, हाई-मॉडल CT स्कैन और फाइब्रो स्कैन जैसी सुविधाएं दीं। वह भारत की टॉप मोस्ट मेडिकल मशीनों के पहले खरीदार बने ताकि सीमांचल के मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज मिल सके।
भविष्य का संकल्प: समाज सेवा और आधुनिकता
आज डॉ. अनिल गुप्ता न केवल एक सफल सर्जन हैं, बल्कि पूर्णिया के लिए एक आधुनिक चिकित्सा प्रदाता भी हैं। उनका कहना है, “जो भी मैं आज हूं, वह पटना की सीख और पूर्णिया वासियों के प्यार की देन है। मेरा लक्ष्य है कि चिकित्सा की आधुनिकतम तकनीक सबसे पहले पूर्णिया को मिले।
