इंसानियत की कमी या बिजनेस का नया तरीका? मुंबई के जुहू बीच पर दुख बांटने की दुकान! रोने-सुनने के लिए तय है रेट कार्ड

डेस्क। न्यूजस्टिच
सपनों के शहर मुंबई की चकाचौंध और भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान के पास सब कुछ है, बस एक चीज की कमी है समय और सुनने वाला कोई अपना। इसी सामाजिक खालीपन को भांपते हुए मुंबई के जुहू बीच पर एक शख्स ने ऐसा धंधा शुरू किया है। जिसे देखकर कोई हैरान है तो कोई भावुक। पृथ्वीराज बोहरा नाम के इस व्यक्ति ने लोगों के दुख सुनने और उनके साथ बैठकर रोने को एक सर्विस (सेवा) का रूप दे दिया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ अनोखा ‘रेट कार्ड’
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है। जिसमें पृथ्वीराज बोहरा जुहू बीच की रेत पर एक बोर्ड लेकर बैठे नजर आ रहे हैं। इस बोर्ड पर जो लिखा है, उसने इंटरनेट जगत में नई बहस छेड़ दी है। पृथ्वीराज ने अपने पोस्टर पर बाकायदा एक प्राइस लिस्ट दी है।

मामूली दुख सुनने के लिए: ₹250

बड़ा दुख सुनने के लिए: ₹500

साथ में बैठकर रोने के लिए: ₹1,000

इसके अलावा, बोर्ड पर दो मोबाइल नंबर (9529214946, 9664171080) और मिलने का समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक अंकित किया गया है।

आखिर क्यों पड़ी ऐसी सर्विस की जरूरत?
पृथ्वीराज बोहरा का यह कदम सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य और अकेलेपन की ओर इशारा करता है। आज के डिजिटल युग में जहां इंसान के पास हजारों सोशल मीडिया फ्रेंड्स हैं। वहीं असल जिंदगी में अपने मन की बात कहने के लिए कोई कंधा मौजूद नहीं है। लोग डिप्रेशन और तनाव से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें डर रहता है कि अगर वे किसी परिचित को अपना दुख बताएंगे तो उनका मजाक उड़ाया जाएगा या उनकी बातों का गलत फायदा उठाया जाएगा।

ऐसे में पृथ्वीराज एक प्रोफेशनल लिसनर (Professional Listener) की भूमिका निभा रहे हैं। वे एक अजनबी के तौर पर लोगों की बातें सुनते हैं, जिससे लोगों को मन हल्का करने का मौका मिलता है और उनकी गोपनीयता भी बनी रहती है।

मजाक या कड़वी सच्चाई?
जहां कुछ लोग इसे पैसे कमाने का एक आसान और अजीबोगरीब तरीका बता रहे हैं। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि यह समाज की विडंबना है। साथ में रोने के लिए 1000 रुपये की मांग यह बताती है कि संवेदनाएं अब बाजार की वस्तु बन चुकी हैं। यह खबर हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम इतने अकेले हो गए हैं कि हमें अपनी आंखों से आंसू बहाने के लिए भी किसी को भुगतान करना पड़ रहा है?

पृथ्वीराज बोहरा की यह दुख की दुकान भले ही आज चर्चा और मीम्स का विषय बनी हो, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश बहुत गहरा है। यह हमारे बीच बढ़ती दूरियों और संवाद की कमी का आईना है। जुहू बीच की लहरों के बीच बैठकर किसी अजनबी का दुख सुनना शायद पृथ्वीराज के लिए रोजगार हो, लेकिन यह मानवता के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है।

सेवा (Service)शुल्क (Charge)
मामूली दुःख सुनने के लिए₹250
बड़ा दुःख सुनने के लिए₹500
साथ में बैठकर रोने के लिए₹1,000

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