सहरसा। न्यूजस्टिच
बिहार के स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली अक्सर चर्चा में रहती है, लेकिन इस बार सहरसा जिले से जो मामला सामने आया है, उसने भ्रष्टाचार और लापरवाही के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। ज़रा सोचिए, एक साधारण सा डिजिटल थर्मामीटर, जिसकी बाजार में कीमत चंद सौ रुपये होती है, उसके लिए सरकारी खजाने से 1 करोड़ 33 लाख 78 हजार 461 रुपये लुटाने की तैयारी कर ली गई। यह सुनने में किसी फिल्मी पटकथा जैसा लग सकता है, लेकिन यह हकीकत है सहरसा सिविल सर्जन कार्यालय की।
क्या है पूरा ‘करोड़ी’ थर्मामीटर का खेल?
मामले का खुलासा तब हुआ जब जैम (GeM) पोर्टल पर जारी किए गए एक टेंडर की डिटेल्स सार्वजनिक हुईं। सरकारी नियमों के मुताबिक, खरीदारी में पारदर्शिता लाने के लिए जैम पोर्टल का उपयोग किया जाता है, लेकिन यहाँ इस पोर्टल को ही ‘चूना’ लगाने की बिसात बिछाई गई। सिविल सर्जन कार्यालय के स्टोर इंचार्ज और रिपोर्टिंग अधिकारी धर्मेंद्र कुमार द्वारा यह बिड (Tender) निकाली गई थी। आश्चर्य की बात यह है कि इस बिड में महज एक थर्मामीटर की कीमत करोड़ों में दिखाई गई। अगर विभाग थोक भाव में 1000 थर्मामीटर भी खरीदता, तो भी उसकी अधिकतम लागत 4 लाख रुपये से ज्यादा नहीं आती। लेकिन यहाँ तो पूरी गंगा ही उलटी बहा दी गई।
तीन कंपनियों की ‘अनोखी’ जुगलबंदी
इस टेंडर प्रक्रिया में तीन निजी कंपनियों ने हिस्सा लिया और मजे की बात यह है कि तीनों ही इस करोड़ों की रेस में शामिल थीं।
हिमानी फार्मा ने 1.33 करोड़ की सबसे कम बोली (L1) लगाई और इसे सप्लाई ऑर्डर दे भी दिया गया। शुभ लक्ष्मी इंटरप्राइजेज ने इसकी बोली 1 करोड़ 34 लाख 40 हजार रुपये थी। दैविक इंटरप्राइजेज एल श्री ने इसकी बिड 1 करोड़ 34 लाख 71 हजार रुपये के करीब थी। जानकारों का कहना है कि जब तीनों कंपनियां करोड़ों की बोली लगा रही थीं, तो यह केवल ‘टाइपिंग एरर’ या मानवीय चूक नहीं हो सकती। यह सीधे तौर पर सरकारी राशि के गबन की एक संगठित कोशिश की ओर इशारा करता है।

अधिकारियों का पल्ला झाड़ू रवैया और जांच के आदेश
जैसे ही यह मामला प्रमंडलीय आयुक्त के संज्ञान में आया, स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में टेंडर को रद्द कर दिया गया है। सिविल सर्जन डॉ. राजनारायण प्रसाद ने इस पूरे मामले की जिम्मेदारी स्टोर इंचार्ज पर डालते हुए कहा कि अधिक जानकारी वही दे सकते हैं। वहीं, डीपीएम विनय रंजन ने स्पष्ट किया कि जिला स्वास्थ्य समिति का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
बजट खपाने की थी साजिश?
चर्चा है कि वित्त वर्ष की समाप्ति और अप्रैल के शुरुआती दिनों में स्वास्थ्य विभाग के पास बची हुई भारी-भरकम राशि को ‘एडजस्ट’ करने के लिए यह खेल खेला गया। अगर प्रमंडलीय आयुक्त इस पर समय रहते कार्रवाई नहीं करते, तो सहरसा स्वास्थ्य विभाग दुनिया का सबसे महंगा थर्मामीटर खरीदने का ‘कलंक’ अपने नाम कर चुका होता। फिलहाल जांच जारी है और सबकी निगाहें इस पर हैं कि इस ‘अजब-गजब’ टेंडर के पीछे के असली खिलाड़ी कौन हैं।

