बिहार की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा नाम सम्राट चौधरी का है। चर्चा इसलिए भी हो रही क्योंकि उनके मांथे बिहार के सीएम का ताज सजेगा। वे भी ऐसे सीएम का जो न केवल नीतीश कुमार के उत्तारधिकारी के तौर पर राजकाज संभालेंगे बल्कि बिहार की राजनीति में वे ऐसे शिखर पुरुष होंगे जिन्हें बिहार भाजपा के पहले मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त होगा। शकुनी चौधरी की राजनीतिक विरासत और सम्राट चौधरी की मेहनत दोनों ही आज लोगों की जुबान पर है। राष्ट्रीय जनता दल में लालू का हाथ थाम कर राजनीति का सफर शुरू करने वाले सम्राट चौधरी के पॉलिटिकल किस्से बहुत हैं। मगर हम आपके लिए उनके प्रारंभिक जीवन की कुछ कहानियां समेट कर लाए हैं। जब सम्राट चौधरी सम्राट हुआ करते थे। स्कूल के छात्र। चलिये जानते हैं सम्राट चौधरी के जीवन के कुछ अनछुए कहानियों को। सम्राट चौधरी उर्फ राकेश कुमार का जन्म मुंगेर जिले के तारापुर के लखनपुर में हुआ। उनके पिता शकुनी चौधरी और पार्वती देवी के पुत्र हैं। उनकी मां पार्वती देवी का भी राजनीति से गहरा नाता रहा है।
मदरसे में हुई है सम्राट चौधरी की प्रारंभिक शिक्षा
सम्राट चौधरी के बचपन के दोस्तों और गांव के बुजुर्गों ने उनके जीवन के ऐसे पन्ने पलटे हैं, जिनसे दुनिया अब तक अनजान थी। लखनपुर के स्थानीय निवासियों ने बताया कि सम्राट की शुरुआती शिक्षा गांव के ही एक मदरसे में हुई थी। उस दौर में वह मदरसा ही शिक्षा का मुख्य केंद्र था, जहाँ सम्राट चौधरी ने हिंदी और संस्कृत के साथ-साथ उर्दू की भी पढ़ाई की।
उनके सहपाठियों के अनुसार, सम्राट ने वर्णमाला (क, ख, ग) सीखने से पहले उर्दू के ‘अलिफ, बे, ते’ का ज्ञान लिया था। लखनपुर उर्दू मध्य विद्यालय के प्रिंसिपल मो. ताबीर बताते हैं:
“यह विद्यालय पहले मदरसा हुआ करता था। हमारे पूर्व शिक्षकों के सानिध्य में सम्राट चौधरी ने यहाँ शिक्षा पाई। आज भी उनके किस्से इस स्कूल की फिजाओं में गूंजते हैं।”
पिता बनाना चाहते थे क्रिकेटर, खेल के लिए पड़ती थी मार
सम्राट चौधरी का बचपन सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं था। वे खेल के मैदान के भी ‘सम्राट’ थे। उनके पिता और दिग्गज नेता शकुनी चौधरी चाहते थे कि उनका बेटा एक शानदार क्रिकेटर बने। खेल के प्रति सम्राट का जुनून ऐसा था कि अक्सर मैदान पर वक्त बिताने के कारण उन्हें पिता की डांट और पिटाई भी खानी पड़ती थी।
उनके बचपन के दोस्तों ने यादों को ताजा करते हुए बताया:
- सम्राट बचपन से ही क्रिकेट खेलने में अव्वल थे।
- मैदान पर खेल के दौरान दोस्तों से तीखी नोक-झोंक भी होती थी, लेकिन उसमें नफरत की कोई जगह नहीं थी।
- पिता शकुनि चौधरी अनुशासन को लेकर सख्त थे और खेल में बेहतर प्रदर्शन के लिए सम्राट को प्रेरित (और कभी-कभी दंडित) भी करते थे।
सांप्रदायिक सौहार्द की जीती-जागती मिसाल
सम्राट चौधरी के बचपन का यह ‘मदरसा कनेक्शन’ आज के दौर में सांप्रदायिक सौहार्द का बड़ा संदेश दे रहा है। उनके दोस्तों का कहना है कि लखनपुर में कभी हिंदू-मुस्लिम का भेदभाव नहीं रहा। सम्राट खुद हिंदू धर्म को मानते हुए भी मदरसे में सहजता से पढ़ते थे। आज भी जब वे गांव आते हैं, तो अपने उन्हीं पुराने मुस्लिम और हिंदू दोस्तों के साथ बिना किसी भेदभाव के मिलते हैं।
गांव में जश्न, राजतिलक की तैयारी
जैसे ही यह खबर पुख्ता हुई कि सम्राट चौधरी बिहार के अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं, लखनपुर गांव में जश्न का माहौल बन गया। ढोल-नगाड़ों और मिठाइयों के साथ लोग अपने चहेते नेता के स्वागत की तैयारी कर रहे हैं। जिस लड़के ने कभी मदरसे की चटाई पर बैठकर ‘अलिफ-बे’ सीखा था, आज वह बिहार की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठने को तैयार है।

