कहते हैं कि “लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।” मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर के रहने वाले सिद्धार्थ कृष्णा ने इन पंक्तियों को न केवल जिया है, बल्कि हकीकत में बदल कर दिखाया है। सिद्धार्थ ने लगातार दूसरी बार देश की सबसे प्रतिष्ठित यूपीएससी (UPSC) परीक्षा में सफलता हासिल कर यह साबित कर दिया कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो आसमान की ऊंचाइयों को छूना नामुमकिन नहीं है।
बैक-टू-बैक सफलता: 680 से 431वीं रैंक तक का सफर
सिद्धार्थ की यह सफलता इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने रुकना नहीं सीखा। पिछली बार उन्होंने यूपीएससी में 680वीं रैंक हासिल की थी, जिसके बाद उनका चयन Indian Audit and Accounts Services (IAAS) के लिए हुआ। वर्तमान में वे शिमला में इसी पद पर प्रशिक्षण (Training) ले रहे हैं। लेकिन मन में आईएएस (IAS) बनने की तड़प और अपनी रैंक सुधारने का लक्ष्य बरकरार था। ट्रेनिंग की व्यस्तता के बीच भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और इस बार 431वीं रैंक लाकर अपनी मेहनत का लोहा मनवा लिया।
आईआईटी खड़गपुर से संघर्ष की शुरुआत
सिद्धार्थ की शैक्षणिक पृष्ठभूमि शानदार रही है। उन्होंने IIT खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। तकनीकी क्षेत्र में करियर बनाने के बजाय उन्होंने सिविल सेवा के जरिए समाज सेवा की राह चुनी। हालांकि, यह रास्ता कांटों भरा था। सिद्धार्थ शुरुआती तीन प्रयासों में असफल रहे। कभी प्रीलिम्स की बाधा नहीं पार हुई, तो कभी इंटरव्यू के करीब पहुँचकर नाम लिस्ट से बाहर हो गया। लेकिन तीन बार की असफलता ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया।
एक माँ का ऐतिहासिक त्याग
सिद्धार्थ की इस सफलता की नींव दो दशक पहले रखी गई थी। जब सिद्धार्थ चौथी कक्षा में थे, तब उनका शैक्षणिक प्रदर्शन औसत था। उनके पिता महेश प्रसाद यादव (वर्तमान में बेगूसराय में डीएसपी) और माता मृदुला यादव दोनों सरकारी सेवा में थे। बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए समय की कमी थी। तब उनकी माँ ने एक साहसी फैसला लिया। उन्होंने अपनी सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़ दी ताकि वे अपने बच्चों के भविष्य को गढ़ सकें। आज जब सिद्धार्थ ने इतिहास रचा, तो माँ की आँखों में खुशी के आंसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि उनका त्याग आज सार्थक हो गया है।
खाकी से गहरा नाता
सिद्धार्थ का परिवार न्याय और अनुशासन से जुड़ा रहा है। पिता डीएसपी हैं और नाना पंचम राय बिहार पुलिस में एसआई पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। परिवार में शुरू से ही देश सेवा का माहौल रहा, जिसने सिद्धार्थ को प्रेरित किया।
निष्कर्ष और संदेश
सिद्धार्थ कृष्णा की कहानी उन युवाओं के लिए एक मिसाल है जो एक या दो विफलता के बाद हिम्मत हार जाते हैं। सिद्धार्थ सिखाते हैं कि अपनी गलतियों से सीखना और लक्ष्य के प्रति अडिग रहना ही सफलता की असली चाबी है।

