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OpenAI CTO Resignation: मां-पिता के लिए छोड़ी करोड़ों की नौकरी! OpenAI के CTO ने श्रीनिवास नारायणन नंबर 2′ की कुर्सी को ठुकराया

डेस्क। न्यूजस्टिच
कल्पना कीजिए एक ऐसे करियर की जो सफलता के शिखर पर हो। दुनिया की सबसे ताकतवर और चर्चित AI कंपनी OpenAI में चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर (CTO – B2B) का पद, करोड़ों की सैलरी और सीधे सैम ऑल्टमैन के साथ काम करने का रुतबा। यह वो मुकाम है जिसे पाने के लिए दुनिया भर के इंजीनियर अपनी पूरी जिंदगी लगा देते हैं। लेकिन 19 अप्रैल 2026 की एक सुबह भारतीय मूल के श्रीनिवास नारायणन ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने टेक जगत की चमक-धमक को मानवीय संवेदनाओं के आगे छोटा साबित कर दिया। श्रीनिवास नारायणन ने अगले सप्ताह के अंत तक OpenAI से इस्तीफा देने का ऐलान किया है। उनका यह फैसला किसी प्रतिस्पर्धी कंपनी में जाने या अपना नया स्टार्टअप शुरू करने के लिए नहीं है, बल्कि अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा और उनके साथ समय बिताने के लिए है।

सफलता की दौड़ और घर की पुकार
श्रीनिवास की यह कहानी महज एक कॉर्पोरेट एग्जिट नहीं है, बल्कि यह उस खामोश संघर्ष का जवाब है जिससे हर प्रवासी भारतीय गुजरता है। नारायणन अप्रैल 2023 में जब OpenAI से जुड़े थे। तब कंपनी रिसर्च से प्रोडक्ट बनने की ओर बढ़ रही थी। साल 2025 में जब उन्हें B2B एप्लिकेशंस का CTO बनाया गया, तो उन पर जिम्मेदारी थी ChatGPT को दुनिया के बड़े बिजनेस घरानों तक पहुंचाने की। उन्होंने डेवलपर API का वो इकोसिस्टम तैयार किया। जिस पर आज लाखों ऐप्स चल रहे हैं। लेकिन जब सफलता अपने चरम पर थी, नारायणन ने एक ठहराव चुना। उन्होंने X और LinkedIn पर साझा किया कि उन्होंने लीडरशिप टीम को पहले ही सूचित कर दिया था। उनके लिए यह सही समय था, क्योंकि हालिया प्रोडक्ट लॉन्च सफल रहे थे और कंपनी का भविष्य अब एक स्थिर दिशा में है।

AI की दुनिया में क्या बदलेगा?
टेक विशेषज्ञों का मानना है कि श्रीनिवास का जाना OpenAI के लिए एक भावनात्मक क्षति तो है, लेकिन तकनीकी रूप से कंपनी का ढांचा काफी मजबूत है। सैम ऑल्टमैन (CEO) और ग्रेग ब्रॉकमैन (President) की जोड़ी रणनीति संभाल रही है। OpenAI का आर्किटेक्चर अब एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। हालांकि एंटरप्राइज AI के क्षेत्र में भरोसे और अनुभव की जो छाप नारायणन ने छोड़ी है, उसे भरने में समय लगेगा।

भारत में इस फैसले की ‘इमोशनल’ गूंज
भारत में यह खबर किसी टेक हेडलाइन से ज्यादा एक संस्कार की तरह देखी जा रही है। एक ऐसे दौर में जहां वर्क-लाइफ बैलेंस सिर्फ किताबों तक सीमित रह गया है। नारायणन ने साबित किया कि परिवार से बड़ा कोई स्टॉक ऑप्शन नहीं होता। भारतीय समाज में माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। नारायणन का यह कदम उन लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल है जो करियर की अंधी दौड़ में अपनों को पीछे छोड़ देते हैं। सिलिकॉन वैली के आलीशान दफ्तरों से लेकर भारत के छोटे शहरों तक इस फैसले की चर्चा है। क्योंकि यहां एक बेटे ने सक्सेस की नई परिभाषा लिखी है। ऐसी सफलता जिसमें घर के बुजुर्गों की मुस्कान शामिल है।

एक युग का अंत या नई शुरुआत?
श्रीनिवास नारायणन का इस्तीफा यह याद दिलाता है कि टेक्नोलॉजी कितनी भी एडवांस क्यों न हो जाए, इंसान की बुनियादी जरूरतें आज भी प्यार, साथ और परिवार ही हैं। यह फैसला एक अंत नहीं है, बल्कि उन यादों को सहेजने की शुरुआत है जो करोड़ों डॉलर के पैकेज से भी ज्यादा कीमती हैं।

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